न्यायपालिका
16 May, 2026

भोजशाला फैसले पर विवाद, जमात-ए-इस्लामी ने जताई गहरी चिंता

जमात-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के भोजशाला मामले से जुड़े फैसले पर चिंता जताते हुए इसे धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यक अधिकारों और सामाजिक सौहार्द के लिए गंभीर बताते हुए कई संवैधानिक प्रश्न उठाए।

नई दिल्ली, 16 मई।

जमात-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के हालिया निर्णय पर गंभीर चिंता व्यक्त की है, जिसमें कमाल मौला मस्जिद को मंदिर स्वरूप से जुड़ा बताया गया है। उन्होंने कहा कि इस तरह के निर्णय न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता, अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे पर गहरा प्रभाव डाल सकते हैं।

उन्होंने अपने बयान में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत प्राप्त धार्मिक अधिकारों की सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न इस निर्णय के बाद सामने आए हैं। उनका कहना था कि भोजशाला परिसर लंबे समय से ऐसे प्रशासनिक ढांचे के अंतर्गत संचालित होता रहा है, जिसमें दोनों समुदायों को अपनी-अपनी धार्मिक परंपराओं के पालन की अनुमति मिली हुई थी। ऐसे में किसी एक समुदाय के स्थापित धार्मिक अधिकारों में परिवर्तन कर दूसरे पक्ष को प्राथमिकता देना परंपरागत व्यवस्था को प्रभावित करता है और समानता के सिद्धांत को कमजोर कर सकता है।

सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने यह भी कहा कि किसी समुदाय को उसके धार्मिक स्थल के बदले वैकल्पिक भूमि देने का सुझाव भी चिंता बढ़ाने वाला है, क्योंकि धार्मिक स्थल केवल भौतिक स्थान नहीं होते बल्कि ऐतिहासिक स्मृति, पहचान और आस्था से गहराई से जुड़े होते हैं। उन्होंने चेताया कि इस तरह की स्थिति से असंतुलन और असंतोष की भावना उत्पन्न हो सकती है।

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक व्याख्याओं के आधार पर ऐसे विवादों का समाधान अत्यंत सावधानी से किया जाना चाहिए, ताकि किसी एक पक्ष के दावों को अनुचित रूप से प्राथमिकता न मिल सके। साथ ही उन्होंने कहा कि इसे अलग घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि धार्मिक स्थलों से जुड़े विवादों के बढ़ते रुझान के हिस्से के रूप में समझा जाना चाहिए।

उन्होंने पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 का हवाला देते हुए कहा कि इसका उद्देश्य स्वतंत्रता के समय के धार्मिक स्वरूप को बनाए रखना था और ऐसे विवादों को दोबारा न खोलना था। उन्होंने आग्रह किया कि इस कानून का पालन उसकी मूल भावना के साथ किया जाए, क्योंकि इसे कमजोर करने से सामाजिक सौहार्द और स्थिरता पर दूरगामी असर पड़ सकता है।

उन्होंने अंत में कहा कि ऐसे मामलों का समाधान संवैधानिक नैतिकता, निष्पक्षता और सभी समुदायों के प्रति न्याय की भावना के आधार पर होना चाहिए।

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