नई दिल्ली, 19 मई।
देश में टैटू उद्योग के बढ़ते विस्तार को देखते हुए उसके नियमन की मांग को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें टैटू पार्लरों के लिए अनिवार्य लाइसेंस व्यवस्था, स्वच्छता मानकों का पालन, टैटू इंक की गुणवत्ता जांच तथा नाबालिगों को अभिभावक की अनुमति के बिना टैटू बनाने पर रोक लगाने की मांग की गई है।
याचिका में टैटू उद्योग के लिए एक समान और स्पष्ट मानक तय करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है, ताकि पूरे देश में एकसमान नियम लागू किए जा सकें।
याचिका में कहा गया है कि वर्तमान में टैटू उद्योग का कारोबार बीस हजार करोड़ रुपये से अधिक तक पहुंच चुका है, लेकिन इसके बावजूद इस क्षेत्र के लिए कोई ठोस नियामक ढांचा मौजूद नहीं है, जिससे कई तरह की समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि नियमन के अभाव में टैटू बनवाने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा बना रहता है, क्योंकि कई जगह एक ही उपकरण का उपयोग कई व्यक्तियों पर किया जाता है, जिससे रक्तजनित रोगों के फैलने की आशंका बढ़ जाती है।
इसमें हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी और एचआईवी एड्स जैसी गंभीर बीमारियों के संक्रमण का जोखिम भी बताया गया है, साथ ही यह भी कहा गया है कि टैटू बनाने में इस्तेमाल होने वाली सुई और रंग शरीर के रक्त एवं अन्य अंगों तक दुष्प्रभाव डाल सकते हैं।
याचिका में विभिन्न मीडिया रिपोर्टों, चिकित्सा पत्रिकाओं और शोध पत्रों का हवाला देते हुए असुरक्षित टैटू प्रक्रिया को लेकर चिंता व्यक्त की गई है और इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए जोखिमपूर्ण बताया गया है।
इसके अलावा टैटू इंक में मौजूद हानिकारक तत्वों पर भी चिंता जताई गई है, जिनमें शीशा और एल्युमिनियम जैसी भारी धातुएं शामिल हो सकती हैं।
याचिका में नाबालिगों को बिना अभिभावक की अनुमति टैटू बनाए जाने पर भी गंभीर आपत्ति जताई गई है और कहा गया है कि यह प्रक्रिया कानूनी रूप से वैध सहमति की श्रेणी में नहीं आती।






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