24 मार्च
चैती छठ पूजा का तीसरा दिन, जिसे “संध्या अर्घ्य” कहा जाता है, इस पावन महापर्व का सबसे महत्वपूर्ण और भावनात्मक चरण माना जाता है। वर्ष 2026 में यह दिन व्रतधारियों की आस्था, संयम और कठिन तपस्या का चरम रूप प्रस्तुत करेगा, जब डूबते हुए सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित किया जाएगा।
खरना के पश्चात आरंभ हुए 36 घंटे के निर्जला व्रत के बीच यह दिन सबसे चुनौतीपूर्ण होता है। व्रती बिना अन्न और जल के रहते हुए भी पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ पूजा की तैयारी करते हैं। यह केवल शारीरिक धैर्य ही नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति की भी परीक्षा होती है।
इस दिन प्रातःकाल से ही घरों में विशेष तैयारियां शुरू हो जाती हैं। व्रती ठेकुआ, चावल के लड्डू, फल, नारियल और गन्ना जैसे पारंपरिक प्रसाद तैयार करते हैं। इन सभी वस्तुओं को बांस की टोकरी में सजा कर अत्यंत पवित्र भाव से रखा जाता है, जो छठ पूजा की शुद्धता और अनुशासन को दर्शाता है।
संध्या समय आते ही श्रद्धालु नदी, तालाब या अन्य पवित्र जलाशयों के किनारे एकत्रित होते हैं। डूबते सूर्य की सुनहरी किरणें, जल में खड़े व्रती, दीपों की रोशनी और गूंजते भक्ति गीत पूरे वातावरण को दिव्यता से भर देते हैं। यह दृश्य आस्था और सामूहिक श्रद्धा का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।
इस पावन अवसर पर व्रती जल में खड़े होकर सूर्य देव को दूध और जल से अर्घ्य अर्पित करते हैं और छठी मैया से परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और संतानों की रक्षा की कामना करते हैं। संध्या अर्घ्य जीवन के हर चरण—उदय और अस्त—दोनों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का संदेश देता है।
चैती छठ का यह तीसरा दिन पूरे पर्व का केंद्र बिंदु माना जाता है, जहां आस्था अपनी सर्वोच्च अवस्था में होती है और व्रती अगले दिन उषा अर्घ्य के साथ व्रत पूर्ण करने की तैयारी करते हैं।













