संपादकीय
23 Apr, 2026

गैस की किल्लत से लौटा चूल्हे का दौर: शादियों में धुएँ के बीच फीका पड़ता प्रबंधन

मध्य प्रदेश में गैस की किल्लत के कारण शादियों में चूल्हों की वापसी हो गई है, जिससे आयोजन और प्रदूषण दोनों पर असर पड़ा है, और प्रशासन इसे रोकने में नाकाम रहा है।

23 अप्रैल
मध्य प्रदेश में इन दिनों एक अजीब दृश्य आम हो गया है। जिस प्रदेश को धुआँ रहित रसोई और उज्ज्वला योजना का मॉडल बताया जाता था, वहाँ आज फिर से बत्तियाँ और चूल्हे की रसोई लौट आई है। शादी-विवाह के सीजन में शहर से लेकर गाँव तक, पंडालों के पीछे जगह-जगह भट्टियाँ धधक रही हैं। एलपीजी की कमी ने हजारों परिवारों को दशकों पीछे धकेल दिया है। यह केवल गैस की कमी नहीं, बल्कि वितरण व्यवस्था की विफलता और कालाबाजारी पर नियंत्रण न कर पाने का स्पष्ट प्रमाण है।
मौजूदा हालात—50 हजार शादियाँ और खाली सिलेंडर। प्रदेश भर में इस समय लगभग 50 हजार से ज्यादा शादियाँ हैं। सीजन के बीच घरेलू और कमर्शियल सिलेंडर दोनों की भारी किल्लत है। टेंट हाउस, कैटरर और विवाह आयोजक मजबूर हैं कि वे भट्टियों का उपयोग करें। घर में वैवाहिक आयोजनों में भी हलवाई लकड़ी और कोयले पर खाना बना रहे हैं। एक तरफ दूल्हा-दुल्हन की शहनाई बज रही है, दूसरी तरफ पीछे धुएँ से आँखें जल रही हैं। यह विरोधाभास बताता है कि नीति और जमीन की हकीकत में कितना फासला है।
प्रशासन का पक्ष और हकीकत का अंतर। जिला खाद्य आपूर्ति नियंत्रक का कहना है कि प्लांट से एजेंसियों को मिलने वाले गैस सिलेंडर का मिलान किया जा रहा है। जिन एजेंसियों ने अवकाश के दिन दुकान बंद रखी, उन पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। विवाहों के चलते नियमों में बदलाव किया गया है और अब कैटरर्स के जरिए ही विवाह के लिए सिलेंडर की आपूर्ति की जा रही है। परंतु जमीन पर स्थिति यह है कि कैटरर को भी सिलेंडर नहीं मिल रहे। नगर निगम, जिला प्रशासन और खाद्य विभाग के तमाम प्रयासों के बाद भी एजेंसी संचालक आपसी मिलीभगत से गैस सिलेंडरों की कालाबाजारी रोकने में सफल नहीं हो पा रहे हैं।
कालाबाजारी की जड़—माँग और आपूर्ति का गणित। शादी के सीजन में एक सामान्य कैटरर को 10 से 15 कमर्शियल सिलेंडर की जरूरत पड़ती है। एक बड़े पंडाल में 25 सिलेंडर तक लग जाते हैं। जब घरेलू उपभोक्ता को ही 15 दिन में सिलेंडर नहीं मिल रहा, तो कमर्शियल सिलेंडर की आपूर्ति कैसे पूरी होगी? इसी मजबूरी का फायदा एजेंसी संचालक उठा रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि 1150 रुपये वाला घरेलू सिलेंडर 1400 से 1600 रुपये में और 2000 रुपये वाला कमर्शियल सिलेंडर 2600 से 3000 रुपये तक बेचा जा रहा है। बिना बिल के सिलेंडर लेने को मजबूर कैटरर यह लागत ग्राहक से वसूलता है, यानी मार अंत में आम आदमी पर ही पड़ती है।
चूल्हे की वापसी—स्वास्थ्य और सुरक्षा दोनों खतरे में। एलपीजी का सबसे बड़ा लाभ था धुआँ रहित रसोई। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार लकड़ी के धुएँ से हर साल लाखों महिलाएँ फेफड़े और आँख की बीमारी की शिकार होती हैं। शादियों में भट्टियों पर काम करने वाले हलवाई 12 से 14 घंटे धुएँ में खड़े रहते हैं। दूसरी समस्या सुरक्षा की है। पंडाल के पास खुली भट्टी, तेज हवा और टेंट का कपड़ा—यह किसी भी समय बड़े हादसे को न्योता दे सकता है। फायर ब्रिगेड की अनापत्ति लेकर चलने वाले टेंट हाउस भी यह जोखिम उठाने को मजबूर हैं, क्योंकि विकल्प ही नहीं बचा।
उज्ज्वला योजना की साख पर सवाल। प्रदेश में लाखों उज्ज्वला कनेक्शन बाँटे गए। उद्देश्य था कि गरीब की रसोई से धुआँ हटे, लेकिन जब सीजन में सिलेंडर ही नहीं मिलेगा, तो कनेक्शन का क्या लाभ? ग्रामीण क्षेत्रों से खबरें हैं कि उज्ज्वला लाभार्थी फिर से लकड़ी बीनने को मजबूर हैं। शहरी गरीब भी 50 रुपये किलो कोयला खरीदकर खाना बना रहा है। गैस एजेंसी पर लंबी लाइन, तीन-तीन दिन की प्रतीक्षा और फिर जवाब मिलता है—स्टॉक खत्म। यह स्थिति सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
व्यवस्था की खामियाँ—कहाँ चूक रहा तंत्र। भंडारण और पूर्वानुमान का अभाव—हर साल शादी का सीजन आता है। अप्रैल-मई और नवंबर से फरवरी तक माँग बढ़ती है। तेल कंपनियों और खाद्य विभाग के पास पिछले 10 साल का डेटा है, फिर भी अतिरिक्त भंडारण की योजना क्यों नहीं बनती? प्लांट से डिस्पैच कम होने का तर्क हर बार दिया जाता है, लेकिन अग्रिम इंडेंट कौन भेजेगा? वितरण पर निगरानी नहीं—कैटरर्स के लिए अलग से कोटा निर्धारित किया गया, पर उसका सत्यापन कौन कर रहा है? कई एजेंसियाँ कागज पर कैटरर को सिलेंडर दिखाकर खुले बाजार में बेच देती हैं। जिला प्रशासन के पास उड़नदस्ता है, पर छापे सिर्फ कागजी खानापूर्ति बनकर रह गए हैं। शिकायत निवारण तंत्र फेल—उपभोक्ता के पास सिलेंडर न मिलने पर शिकायत करने के लिए नंबर तो हैं, पर कार्रवाई नहीं होती। एजेंसी कह देती है बैकलॉग है और फाइल बंद। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक एजेंसी की मनमानी चलती रहेगी। वैकल्पिक व्यवस्था नहीं—यदि कमर्शियल सिलेंडर की कमी है, तो प्रशासन अस्थायी रूप से पीएनजी आधारित मोबाइल किचन, सामुदायिक रसोई या बायोगैस के विकल्प क्यों नहीं देता? आपदा प्रबंधन की तरह शादी सीजन को प्रबंधन क्यों नहीं मानता?
महँगी होती शादियाँ, पिटता कारोबार। कैटरिंग का रेट पहले से तय होता है। जब सिलेंडर 2600 का लेना पड़े या लकड़ी-कोयला खरीदना पड़े, तो लागत 20 प्रतिशत बढ़ जाती है। यह बोझ या तो ग्राहक उठाता है या कैटरर घाटा सहता है। छोटे टेंट हाउस और हलवाई बुकिंग कैंसिल कर रहे हैं। मजदूरों को काम नहीं मिल रहा। एक अनुमान के अनुसार केवल भोपाल में ही कैटरिंग व्यवसाय को इस सीजन में 15 करोड़ से ज्यादा का नुकसान हो चुका है। इसका असर किराना, सब्जी, डेकोरेशन सब पर पड़ रहा है।
पर्यावरण पर दोहरी मार। सरकार एक तरफ पेड़ लगाने की बात करती है, दूसरी तरफ गैस न मिलने से हजारों पेड़ हर दिन चूल्हे में झोंके जा रहे हैं। एक बड़ी शादी में 2 क्विंटल से ज्यादा लकड़ी जलती है। 50 हजार शादियों का हिसाब लगाएँ, तो पर्यावरण को हुए नुकसान का अंदाजा आसान है। धुएँ से शहरों का एयर क्वालिटी इंडेक्स भी बिगड़ रहा है। यानी गैस की किल्लत स्वास्थ्य, सुरक्षा और पर्यावरण तीनों पर मार कर रही है।
समाधान की राह—वादे नहीं, व्यवस्था चाहिए। जिला स्तर पर कंट्रोल रूम बनाकर शादी वाले परिवार और पंजीकृत कैटरर को प्राथमिकता पर सिलेंडर देना, आधार और विवाह कार्ड के आधार पर 48 घंटे में डिलीवरी सुनिश्चित करना। दूसरा, सभी एजेंसियों का स्टॉक हर शाम सार्वजनिक पोर्टल पर डालना—पारदर्शिता से कालाबाजारी रुकेगी। तीसरा, कमर्शियल सिलेंडर की होम डिलीवरी पर लगी रोक को सीजन तक हटाना, ताकि कैटरर को एजेंसी के चक्कर न लगाने पड़ें। हर जिले में बफर स्टॉक बनाना। तेल कंपनियाँ शादी सीजन से एक माह पहले अतिरिक्त रैक मँगाएँ। दूसरा, उड़नदस्तों को अधिकार देना कि वे बिना सूचना एजेंसी का भौतिक सत्यापन करें—गड़बड़ी पर लाइसेंस निलंबन का प्रावधान सख्ती से लागू हो। तीसरा, कैटरर्स का पंजीयन और उन्हें सालाना कोटा देना, ताकि अचानक माँग का दबाव न बने। पहला, पाइप्ड नेचुरल गैस नेटवर्क का विस्तार—जहाँ पीएनजी है, वहाँ सिलेंडर की माँग घटेगी। दूसरा, सामुदायिक बायोगैस प्लांट को बढ़ावा—बड़े मैरिज गार्डन में अनिवार्य करना कि वे 30 प्रतिशत ईंधन बायोगैस से लें। तीसरा, उपभोक्ता जागरूकता—जनता को बताना कि बिल लेकर ही सिलेंडर लें, ज्यादा रेट पर न खरीदें।
चूल्हा संस्कृति नहीं, मजबूरी है। चूल्हा हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है, पर 2026 में सिलेंडर होते हुए चूल्हे पर लौटना मजबूरी है, तरक्की नहीं। शादियाँ जीवन का उत्सव हैं, इन्हें धुएँ में नहीं, रोशनी में मनाया जाना चाहिए। खाद्य विभाग, तेल कंपनियाँ और जिला प्रशासन यदि समन्वय से काम करें, तो यह किल्लत एक सप्ताह में खत्म हो सकती है। जरूरत केवल इच्छाशक्ति की है।
नागरिक भी समझें कि कालाबाजारी को बढ़ावा न दें। महँगा सिलेंडर खरीदकर हम समस्या को और गहरा करते हैं। एजेंसी की शिकायत हेल्पलाइन 1800 233 3555 और स्थानीय कलेक्टर को तुरंत करें। सरकार को याद रखना होगा कि गैस केवल ईंधन नहीं, सम्मान है। उज्ज्वला का नारा था—धुआँ नहीं, सम्मान। आज उसी सम्मान पर धुएँ की परत चढ़ गई है। यदि अब भी व्यवस्था नहीं सुधरी, तो अगली बार लोग चूल्हे के साथ सरकार से भी मुँह मोड़ लेंगे। बत्ती और चूल्हे की रसोई अतीत की बात होनी चाहिए, वर्तमान की मजबूरी नहीं।
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भाग्यशाली अंक: 9
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