संपादकीय
23 Apr, 2026

तेज हेडलाइट्स का आतंक: परिवहन विभाग की नाकामी से सड़कों पर मौत का अंधेरा

तेज हेडलाइट्स और नियमों की अनदेखी से सड़क हादसों की संख्या बढ़ रही है। परिवहन विभाग की लापरवाही के कारण हादसों में वृद्धि, जिसमें अंधेरे में देखाई देने वाली तेज रोशनी प्रमुख कारण है।

23 अप्रैल।
केंद्रीय मोटर वाहन नियम 1979 की धारा 138 साफ कहती है: 12 वोल्ट सिस्टम में 60 से 65 वाट और 24 वोल्ट में 70 से 75 वाट से ज्यादा का बल्ब नहीं लगेगा। कंपनी से गाड़ी 55 से 75 वाट के हैलोजन हेडलाइट के साथ निकलती है, लेकिन सड़कों का सच अलग है। आज अधिकांश गाड़ियों में 110 से 150 वाट के बल्ब, चार-चार, छह-छह एलईडी बार और एचआईडी लाइटें लगी हैं। परिवहन विभाग के नियमों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ रही हैं और विभाग आँख मूंदे बैठा है।
सडन ब्लाइंडनेस हादसे की सबसे बड़ी वजह। 2026 की पहली तिमाही में प्रदेश में कुल 20,965 सड़क हादसे हुए। इनमें से 9,313 दुर्घटनाएँ शाम 6 बजे के बाद अंधेरा होने पर हुईं। इन हादसों में 28 प्रतिशत से ज्यादा घायलों ने एक ही बात कही: सामने से आने वाले वाहन की तेज रोशनी से कुछ सेकेंड के लिए आँखों के सामने अंधेरा छा गया। डॉक्टरी भाषा में इसे टेंपरेरी सडन ब्लाइंडनेस कहते हैं। बीते 3 महीने में ढाई हजार से ज्यादा सड़क दुर्घटनाएँ केवल गाड़ी की तेज लाइट के कारण हुईं। यह आँकड़ा नहीं, चीख है। फिर भी परिवहन विभाग के कान पर जूँ नहीं रेंग रही।
तकनीक का दुरुपयोग: हैलोजन से लेजर तक की अराजकता। 1990 तक बड़े वाहनों में आधी कट वाली हेडलाइट आती थी। रोशनी सड़क पर रहती थी, आँख में नहीं जाती थी। बाद में हेडलाइट पर काली पट्टी लगाने का नियम आया। अब हालत यह है कि आफ्टर मार्केट में हाई इंटेंसिटी डिस्चार्ज (एचआईडी) और लाइट एमिटिंग डायोड (एलईडी) हेडलाइट धड़ल्ले से बिक रही हैं।
लाइटों का काला सच—हैलोजन: कम रोशनी, पीला प्रकाश, सबसे सुरक्षित; नियमों के अनुसार यही मानक है। एचआईडी: तेज और सफेद रोशनी, आँखों को चौंधिया देती है; गलत फोकस पर जानलेवा। एलईडी: सही फिटिंग और कट-ऑफ लाइन पर ठीक, लेकिन सस्ती और गलत एलाइनमेंट वाली एलईडी सबसे खतरनाक। लेजर लाइट: बहुत तेज, सबसे ज्यादा नुकसानदायक; निजी वाहनों में प्रतिबंधित, फिर भी ट्रकों में लगी मिलती हैं। प्रोजेक्टर हेडलाइट: सही एलाइनमेंट पर सुरक्षित, गलत पर खतरनाक। डीआरएल: दिन के लिए बनी लाइट, रात में बेकार; कुछ लोग इसे भी तेज कर चलाते हैं।
परिवहन विभाग की सोई हुई मशीनरी। शहरी क्षेत्र में हाई बीम पर चलने वाले वाहनों का चालान करने का अधिकार ट्रैफिक पुलिस के पास है, लेकिन यातायात विभाग सिर्फ सीट बेल्ट और हेलमेट चेक कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है। तेज हेडलाइट चेक करने के लिए लक्स मीटर नाम का उपकरण होता है। पूरे प्रदेश में कितने जिलों के पास यह उपकरण है, जवाब शून्य के करीब है। आरटीओ में गाड़ी पास कराते समय हेडलाइट की तीव्रता कोई नहीं नापता। फिटनेस सर्टिफिकेट पैसे देकर मिल जाता है, लाइट चाहे 200 वाट की हो। नियम तोड़े जा रहे हैं, जिंदगियाँ टूट रही हैं।
एक तरफ नियम कहता है 60 वाट, दूसरी तरफ बाजार में 150 वाट के बल्ब खुले बिक रहे हैं। ऑनलाइन साइट्स पर “सुपर ब्राइट”, “बीम ब्लास्टर” के नाम से एलईडी बार बिक रही हैं। इनकी बिक्री पर रोक कौन लगाएगा, दुकानदार पर छापा कौन मारेगा? परिवहन विभाग या पुलिस—दोनों एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर पल्ला झाड़ लेते हैं। नतीजा यह कि रात में दोपहिया चालक, साइकिल सवार और पैदल चलने वाला सबसे ज्यादा मर रहा है। छोटी गाड़ी वाला हमेशा डरकर चलता है, क्योंकि सामने से ट्रक-डंपर की चार-चार लाइटें आँखें बंद कर देती हैं।
विभाग को फटकार—कब जागेगी व्यवस्था? परिवहन विभाग से सीधे सवाल हैं। पहला, जब नियम 60-65 वाट का है तो 125-150 वाट के बल्ब बाजार में कैसे बिक रहे हैं, बिक्री पर प्रतिबंध क्यों नहीं? दूसरा, हर जिले में लक्स मीटर और हेडलाइट बीम टेस्टर क्यों नहीं? तीसरा, फिटनेस पास करते समय हेडलाइट की जाँच अनिवार्य क्यों नहीं? चौथा, रात में विशेष अभियान चलाकर केवल हेडलाइट चेकिंग क्यों नहीं होती? हेलमेट से ज्यादा मौतें तो सडन ब्लाइंडनेस से हो रही हैं।
यातायात पुलिस की ड्यूटी सिर्फ चौराहे पर खड़े होकर चालान काटना नहीं है। रात 8 बजे के बाद हाईवे पर गश्त कर तेज हेडलाइट वाले वाहनों को रोकना भी इनका काम है, लेकिन विभाग की प्राथमिकता में यह मुद्दा है ही नहीं।
समाधान क्या है? इच्छाशक्ति चाहिए, नया कानून नहीं। नया कानून बनाने की जरूरत नहीं; जो नियम हैं, वही लागू कर दिए जाएँ तो 28 प्रतिशत हादसे रुक जाएँ। इसके लिए चार कदम तुरंत उठाने होंगे। पहला कदम—आफ्टर मार्केट में 75 वाट से ऊपर के हेडलाइट बल्ब और एलईडी बार की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध, दुकानों पर छापामारी और सीज की कार्रवाई। दूसरा कदम—हर आरटीओ और ट्रैफिक थाने को लक्स मीटर देना, फिटनेस और पीयूसी की तरह हेडलाइट बीम टेस्ट अनिवार्य करना। तीसरा कदम—रात में विशेष अभियान; हाई बीम, अतिरिक्त एलईडी बार, लेजर लाइट पर मौके पर चालान और लाइट जब्त। पहली बार 2000 रुपये, दूसरी बार 5000 रुपये और परमिट निरस्त। चौथा कदम—जागरूकता; वाहन चालकों को बताना कि लो बीम शहर में, हाई बीम केवल हाईवे पर, जब सामने गाड़ी न हो। काली पट्टी का नियम फिर से सख्ती से लागू करना।
लोगों की लापरवाही की कीमत जान देकर चुका रहे हैं। 20,965 हादसों में 9,313 रात के हैं और 28 प्रतिशत ने तेज लाइट को वजह बताया। यह आँकड़ा परिवहन विभाग के मुँह पर तमाचा है। सड़क बनाने से विकास नहीं होता, सड़क को सुरक्षित बनाना सरकार की जिम्मेदारी है। तेज हेडलाइट कोई छोटी गलती नहीं, यह सीधे-सीधे हत्या का सामान बन चुकी है। यदि परिवहन विभाग, यातायात पुलिस और नीति निर्धारक अब भी नहीं जागे, तो हादसों की यह संख्या अगले 3 महीने में और बढ़ेगी। विभाग को समझना होगा कि हेलमेट और सीट बेल्ट जरूरी हैं, लेकिन आँखें खुली रहेंगी तभी हेलमेट काम आएगा। सडन ब्लाइंडनेस के कुछ सेकेंड ही परिवार उजाड़ने के लिए काफी हैं। इसलिए अब फटकार नहीं, कार्रवाई चाहिए—नियम लागू कीजिए, वरना हर मौत की जिम्मेदारी आपकी होगी।
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