संपादकीय
22 Apr, 2026

महिला आरक्षण की जंग: संसद से घर-घर तक पहुंचा राजनीतिक संघर्ष

महिला आरक्षण विधेयक को लेकर संसद से सड़क तक तेज होते राजनीतिक संघर्ष और इसके संभावित प्रभावों ने भारतीय राजनीति में नई बहस को जन्म दिया है, जिसमें सत्ता और विपक्ष आमने-सामने हैं।

22 अप्रैल।
महिला आरक्षण सबका संकल्प है, लेकिन इसके क्रियान्वयन की राह राजनीतिक टकरावों से भरी हुई है। लोकसभा चुनाव 2029 से महिला आरक्षण सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लाया गया नारी शक्ति वंदन विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो सका। इसके बाद सियासी आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। सरकार विपक्ष पर महिला विरोधी होने का आरोप लगा रही है, जबकि विपक्ष इसे बीजेपी की परिसीमन रणनीति से जोड़कर देख रहा है।
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे चुनावी राज्यों में महिला आरक्षण का मुद्दा बीजेपी के लिए संभावित राजनीतिक लाभ का माध्यम बनता दिख रहा है। वहीं तृणमूल कांग्रेस और डीएमके इस विधेयक को अपने राज्यों के हितों के प्रतिकूल बताने में जुटी हैं। राजनीतिक दृष्टिकोण अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन इतना स्पष्ट है कि महिला आरक्षण का मुद्दा अब केंद्र में आ चुका है। संभावना व्यक्त की जा रही है कि आगामी लोकसभा चुनाव तक इसे लागू करने की दिशा में ठोस पहल हो सकती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी इस मुद्दे को अपने प्रमुख राजनीतिक एजेंडे में बनाए रखने के संकेत दे रहे हैं। राम मंदिर की तरह महिला आरक्षण भी एक ऐसा मुद्दा बन सकता है, जो व्यापक राजनीतिक प्रभाव उत्पन्न करे। वर्ष 2023 में महिला आरक्षण पर सभी दलों की सहमति से विधेयक पारित हुआ था, हालांकि तत्कालीन लोकसभा चुनाव में इसका अपेक्षित राजनीतिक लाभ बीजेपी को नहीं मिला।
भारतीय राजनीति में यह देखा गया है कि कई बार किसी मुद्दे के विरोध से भी राजनीतिक लाभ मिलता है। राम जन्मभूमि आंदोलन इसका प्रमुख उदाहरण रहा है। कांग्रेस का यह दावा रहा है कि जन्मभूमि का ताला राजीव गांधी के समय खुला, जो तथ्यात्मक रूप से सही है, लेकिन जनधारणा में इस आंदोलन ने कांग्रेस को उल्लेखनीय राजनीतिक नुकसान पहुंचाया।
महिला आरक्षण के संदर्भ में भी कांग्रेस अपने समर्थन की बात करती है, लेकिन विधेयक का विरोध कर उसने राजनीतिक जोखिम उठाया है। क्षेत्रीय दलों का रुख भी काफी हद तक कांग्रेस के अनुरूप रहा है। आने वाले पांच राज्यों के चुनाव परिणाम इस मुद्दे की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। यदि इन चुनावों में बीजेपी और एनडीए को इसका राजनीतिक लाभ नजर आता है, तो प्रक्रिया को नए स्वरूप में आगे बढ़ाया जा सकता है। बीजेपी यह भी समझती है कि केवल विपक्ष के विरोध के आधार पर महिला मतदाताओं का समर्थन लंबे समय तक नहीं प्राप्त किया जा सकता, इसके लिए ठोस क्रियान्वयन आवश्यक होगा। प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संबोधन में इस कानून को लागू करने की प्रतिबद्धता दोहराई है।
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने विभिन्न राजनीतिक मुद्दों पर सरकार का पक्ष रखा और कांग्रेस सहित अन्य दलों की नीतियों की आलोचना भी की। चुनावी राज्यों में यह तर्क भी सामने आ रहा है कि यदि परिसीमन के साथ महिला आरक्षण लागू होता, तो संबंधित राज्यों की प्रतिनिधित्व क्षमता में वृद्धि होती।
बीजेपी शासित राज्यों में विधानसभा सत्र बुलाकर विपक्ष के विरोध के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित किए जा रहे हैं। सार्वजनिक स्तर पर भी प्रदर्शन हो रहे हैं। राहुल गांधी के सरकारी आवास के बाहर बीजेपी की महिला नेताओं द्वारा विरोध प्रदर्शन इसी कड़ी का हिस्सा है।
विश्लेषकों का मानना है कि महिला आरक्षण के क्रियान्वयन में जितना अधिक राजनीतिक प्रतिरोध होगा, उतना ही इसका श्रेय सत्तारूढ़ पक्ष की ओर झुक सकता है। तकनीकी दृष्टि से यह मुद्दा दशकों से लंबित रहा है और इसे आगे बढ़ाने का प्रयास वर्तमान सरकार ने किया है। यदि वर्तमान सीटों पर सहमति बनती, तो यह व्यवस्था पहले ही लागू हो सकती थी।
विपक्ष भले ही परिसीमन प्रक्रिया को लेकर एकजुटता दिखाए, लेकिन यह संवैधानिक आवश्यकता है। चुनाव केवल परिसीमन से तय नहीं होते। वर्तमान लोकसभा और विधानसभा सीटों का निर्धारण पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों के दौरान हुआ था, और इन्हीं सीटों पर आज बीजेपी बहुमत हासिल कर रही है। दोनों दलों के बीच विश्वास का अभाव भी इस विवाद को गहरा करता है।
कांग्रेस ने महिला आरक्षण के अलावा धारा 370, सीएए, एनआरसी, वक्फ विधेयक, एसआईआर, सर्जिकल स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर जैसे मुद्दों पर भी सरकार का विरोध किया है।
आगे चलकर महिला आरक्षण और परिसीमन पर कांग्रेस तथा अन्य विपक्षी दलों को अपने रुख में बदलाव करना पड़ सकता है। सभी राज्यों में समानुपातिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के प्रस्ताव पर सहमति बनना आवश्यक होगा। भले ही फिलहाल सरकार कुछ कदम पीछे हटती दिखे, लेकिन संकेत यही हैं कि अगला कदम अधिक ठोस होगा। महिला आरक्षण भले ही बीजेपी के मूल एजेंडे का हिस्सा न रहा हो, लेकिन महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ने इसे मजबूती प्रदान की है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लक्ष्य स्पष्ट है कि वर्ष 2029 का लोकसभा चुनाव महिला आरक्षण के साथ कराया जाए। यदि ऐसा होता है, तो इसके राजनीतिक प्रभाव भी व्यापक होंगे। अब तक के अनुभव बताते हैं कि सरकार के मुद्दों का विरोध ही कई बार उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बन जाता है।
-मंगला मिश्रा
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