22 अप्रैल।
पिछले दिनों मध्य प्रदेश के एक माननीय विधायक के बोल चर्चा का विषय बने हुए हैं। यह केवल पुलिस प्रशासन को नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था को सीधी चुनौती है। मध्य प्रदेश में कानून-व्यवस्था और सुशासन को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत बार-बार इन दावों की पोल खोलती नजर आती है। हालिया घटनाएं, खासकर ग्वालियर-चंबल संभाग में, इस बात का स्पष्ट संकेत देती हैं कि सत्ता के मद में चूर कुछ जनप्रतिनिधि न केवल कानून को चुनौती दे रहे हैं, बल्कि प्रशासनिक तंत्र को भी खुली धमकी देने से नहीं चूक रहे।
सवाल यह है कि क्या यह वही राज्य है जहां सुशासन की बात की जाती है। एक ओर बिना नंबर की गाड़ी से घूमते “माननीय” के पुत्र द्वारा दुर्घटना करना और कार्रवाई होने पर पुलिस अधिकारियों को धमकाना, दूसरी ओर ट्रैक्टर से कुचलकर एक वनरक्षक की निर्मम हत्या—ये घटनाएं किसी सामान्य अव्यवस्था का संकेत नहीं, बल्कि कानून के प्रति खुले विद्रोह का उदाहरण हैं। स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब आरोप सत्ता से जुड़े लोगों पर लगते हैं और कार्रवाई की बजाय “समझाइश” का रास्ता अपनाया जाता है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सुशासन के लिए कई पहलें की हैं, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन सुशासन सिर्फ बैठकों, निर्देशों और अपीलों से स्थापित नहीं होता। जब तक सत्ता के गलियारों में बैठे प्रभावशाली लोगों पर सख्त और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं होगी, तब तक यह संदेश जनता तक नहीं पहुंचेगा कि कानून सबके लिए समान है।
करेरा की घटना ने स्पष्ट कर दिया है कि स्थानीय स्तर पर राजनीतिक संरक्षण किस तरह कानून को बौना बना देता है। पुलिस यदि अपनी जिम्मेदारी निभाने की कोशिश करती है, तो उसे दबाव और धमकियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में प्रशासनिक मनोबल टूटना स्वाभाविक है।
अब सवाल यह है कि क्या सिर्फ “बुलाकर समझाना” पर्याप्त है। क्या ऐसे मामलों में उदाहरण प्रस्तुत करने वाली कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। जब तक दोषियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं होगी, चाहे वे किसी भी राजनीतिक दल या पद से जुड़े हों, तब तक यह संदेश नहीं जाएगा कि शासन वास्तव में गंभीर है।
प्रदेश की जनता अब सिर्फ बयानबाजी नहीं, बल्कि परिणाम चाहती है। उन्हें यह भरोसा चाहिए कि उनका राज्य कानून के शासन पर चलता है, न कि रसूख के दम पर। मुख्यमंत्री के सामने चुनौती स्पष्ट है—या तो वे सख्त निर्णय लेकर सुशासन की साख को मजबूत करें, या फिर ऐसी घटनाएं उनके प्रयासों पर सवाल उठाती रहेंगी।
लगातार ऐसी घटनाओं के कारण प्रदेश की छवि पर विपरीत असर पड़ रहा है। मुख्यमंत्री के सुशासन देने के प्रयासों और मेहनत पर भी इसका असर दिखाई देता है। ऐसे लोगों पर कड़ी कार्रवाई कर एक बेहतर प्रशासन और संवेदनशील सरकार का स्पष्ट संदेश देना अब आवश्यक हो गया है।