पहलगाम की बैसरन घाटी, जो कभी कश्मीर के प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में जानी जाती थी, एक साल पहले हुए आतंकवादी हमले के बाद वीरान हो गई है, जिससे हजारों परिवारों की आजीविका पर असर पड़ा है। अब यहां सुरक्षा और स्थायी रोजगार सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है।
23 अप्रैल।
पहलगाम की बैसरन घाटी कभी कश्मीर की शान थी। हरे-भरे घास के मैदान, चीड़ के जंगल और बर्फीली चोटियों का नजारा देखने देश ही नहीं, पूरी दुनिया से पर्यटक आते थे। स्थानीय लोग इसे मिनी स्विट्जरलैंड कहते थे। लेकिन आज से ठीक एक साल पहले, 22 अप्रैल को जंगल की तरफ से आए आतंकियों ने 13 मिनट में 26 लोगों को नाम, जाति और धर्म पूछकर गोली मार दी। उस दिन केवल 26 जानें नहीं गईं, बल्कि बैसरन घाटी की रौनक, हजारों परिवारों का रोजगार और कश्मीर के पर्यटन का भरोसा भी गोलियों से छलनी हो गया। एक साल बीत गया, मगर घाटी अब तक वीरान है।
वो काला दिन: 13 मिनट में उजड़ गई दुनिया। 22 अप्रैल को भी हर दिन की तरह पर्यटक बैसरन घाटी पहुँचे थे। बच्चे घास पर खेल रहे थे, जोड़े तस्वीरें ले रहे थे, गाइड घोड़ों के साथ खड़े थे। तभी जंगल से निकले हथियारबंद आतंकियों ने लोगों को एक तरफ इकट्ठा किया, नाम पूछा, पहचान पत्र देखे और चुन-चुनकर 26 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। चीखें, खून और दहशत के बीच बैसरन की वादियाँ सन्न रह गईं। हमले के बाद सेना और पुलिस पहुँची, लेकिन तब तक घाटी की साँसें थम चुकी थीं। उस दिन के बाद से बैसरन घाटी पर्यटकों के लिए बंद है।
आँकड़ों की जुबानी: कितना बड़ा नुकसान। हमले से पहले प्रतिदिन 10 हजार से ज्यादा पर्यटक पहलगाम और बैसरन घाटी आते थे। होटल, टेंट, घोड़े, खच्चर, गाइड, फोटोग्राफर, शॉल-कहवा बेचने वाले—सबकी रोजी चलती थी। आज पहलगाम में भी 2 हजार से कम लोग आ रहे हैं। पूरे कश्मीर के 48 पर्यटन स्थलों में से 6 अब भी बंद हैं। बैसरन घाटी के अलावा चंदनवाड़ी, गुरेज, आठवतू, बंगस और रामकुंड को सुरक्षा मंजूरी नहीं मिली। यानी सुरक्षा के नाम पर पर्यटन का एक बड़ा हिस्सा एक साल से ताले में बंद है।
रोजगार का कत्ल: गोलियों से ज्यादा गहरी मार। आतंकियों ने 26 लोगों की हत्या की, मगर उस दिन हजारों परिवारों की भी आजीविका छिन गई, जिनका पेट पर्यटकों से चलता था। बैसरन घाटी में 300 से ज्यादा पंजीकृत गाइड थे, आज ज्यादातर बेरोजगार हैं। कई ने मजबूरी में घोड़े और खच्चर बेच दिए। टैक्सी और गाड़ियों की किश्तें टूट गईं, सो गाड़ियाँ भी बिक गईं। रेस्टोरेंट, ढाबे, शॉल की दुकानें, सूखे मेवे की दुकानें बंद पड़ी हैं। होटल खाली हैं, कर्मचारियों को निकाल दिया गया। जो परिवार तीन पीढ़ी से पर्यटन से जुड़ा था, वह आज दिहाड़ी मजदूरी को मजबूर है। कई परिवार गाँव छोड़कर जम्मू या पंजाब चले गए।
मनोवैज्ञानिक असर: खौफ जो अभी भी जिंदा है। बैसरन घाटी खुल भी जाए, तो सवाल यह है कि क्या पर्यटक आएँगे? 22 अप्रैल की घटना ने पर्यटकों के मन में डर बैठा दिया है। टूर ऑपरेटर बताते हैं कि ग्राहक पहले ही पूछते हैं—क्या पहलगाम सुरक्षित है? बैसरन का नाम सुनते ही बुकिंग कैंसिल हो जाती है। स्थानीय गाइड कहते हैं, हमले की वीडियो अब भी मोबाइल में घूमती है। लोग हमें देखते हैं, तो उस दिन की याद आ जाती है। यानी घाटी का ताला सुरक्षा बल खोल देंगे, लेकिन भरोसे का ताला कौन खोलेगा?
सुरक्षा और पर्यटन: संतुलन क्यों नहीं बन पाया। प्रशासन का तर्क है कि जब तक पूरी तरह सुरक्षा मंजूरी नहीं मिलती, बैसरन घाटी नहीं खोली जा सकती। जंगल से सटा इलाका है, घात लगाकर हमला आसान है। लेकिन सवाल यह है कि एक साल में स्थायी चौकी, ड्रोन निगरानी, सड़क पर कैमरे और त्वरित कार्रवाई दल क्यों नहीं बने? अमरनाथ यात्रा हर साल सुरक्षित होती है, तो बैसरन क्यों नहीं? 48 में से 42 जगह खुल गईं, तो बाकी 6 को और कितना इंतजार करना पड़ेगा? देरी से संदेश जाता है कि खतरा अभी टला नहीं, और यही संदेश पर्यटन को मार रहा है।
स्थानीय लोगों की पीड़ा: हम तो पहले भी यहीं थे। गाइड यूनियन का दर्द साफ है। वे कहते हैं, हमने आतंकियों को नहीं बुलाया, हम तो हमेशा पर्यटकों का स्वागत करते आए हैं। हमारे ही भाई-बेटे हमले में मारे गए, फिर सजा हमें क्यों? सरकार मुआवजा देती है, पर स्थायी रोजगार नहीं देती। कुछ युवाओं को होमगार्ड में लिया गया, पर 6 हजार महीने में घर नहीं चलता। महिलाएँ जो शॉल बुनती थीं, उनके पास खरीददार नहीं। बच्चे स्कूल छोड़ रहे हैं। एक पूरी पीढ़ी बर्बाद हो रही है।
आगे का रास्ता: वीरानी से वापसी कैसे हो। पहला कदम—सुरक्षा का भरोसा देना। बैसरन घाटी में स्थायी सुरक्षा चौकी, सीसीटीवी, ड्रोन और आपातकालीन हेल्पलाइन तुरंत शुरू हो। सेना और पुलिस का संयुक्त मार्ग गश्त हो। जब तक पर्यटक को लगेगा नहीं कि वह सुरक्षित है, वह नहीं आएगा। चरणबद्ध शुरुआत—पहले दिन में सीमित समय के लिए पंजीकृत गाइड और ऑनलाइन अनुमति के साथ घाटी खोले। हर ग्रुप के साथ सुरक्षा कर्मी रहें। धीरे-धीरे समय बढ़ाया जाए। आर्थिक पैकेज—बैसरन पर निर्भर परिवारों का सर्वे कर एकमुश्त सहायता और कम ब्याज पर ऋण दिया जाए। घोड़े-खच्चर खरीदने, दुकान फिर से शुरू करने के लिए अनुदान मिले। पर्यटन विभाग इन परिवारों को वैकल्पिक पर्यटन स्थलों पर काम दे। छवि सुधार—राष्ट्रीय स्तर पर अभियान चलाया जाए कि कश्मीर सुरक्षित है। बैसरन घाटी को शहीदों की याद में शांति उद्यान बनाकर खोला जाए। हमले की बरसी पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम हो, ताकि दुनिया देखे कि कश्मीर डर से नहीं, हौसले से जीता है। स्थानीय भागीदारी—गाइड और घोड़े वालों को ग्राम पर्यटन समिति में शामिल कर सुरक्षा की जिम्मेदारी भी दी जाए। जब स्थानीय व्यक्ति निगरानी करेगा, तो घुसपैठ मुश्किल होगी।
बंद घाटी, खुले जख्म। बैसरन घाटी केवल पर्यटन स्थल नहीं थी, वह कश्मीर की साझी संस्कृति और उम्मीद का प्रतीक थी। 22 अप्रैल के हमले ने उस प्रतीक को तोड़ दिया। 26 परिवारों के चिराग बुझे और हजारों परिवारों के चूल्हे ठंडे पड़ गए। एक साल बीत गया, मगर घाटी पर वीरानी छाई है। सरकार को समझना होगा कि गोली का जवाब सिर्फ बंदूक से नहीं, रोजगार से भी दिया जाता है। जब तक बैसरन के गाइड को फिर से पर्यटक नहीं मिलेगा, जब तक घोड़े की टाप फिर से घास पर नहीं गूँजेगी, तब तक आतंकियों की जीत मानी जाएगी। कश्मीरियत जिंदा है, पर उसे सहारे की जरूरत है। बैसरन घाटी को खोलना केवल पर्यटन का सवाल नहीं, यह उन 26 आत्माओं को सच्ची श्रद्धांजलि होगी और उन हजारों परिवारों के लिए न्याय होगा, जो बिना गुनाह के सजा काट रहे हैं। वक्त आ गया है कि डर के ताले तोड़कर घाटी में फिर से जिंदगी लौटाई जाए, वरना वीरानी की यह चादर और लंबी होती जाएगी और खामोशी के बीच सिर्फ गोलियों की गूँज याद रह जाएगी। आज भी यदि बैसरन घाटी के जख्मों को भरना है, तो कश्मीरियों को आगे आना होगा।