जबलपुर, 27 अप्रैल
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर स्थित मुख्यपीठ में सोमवार को ओबीसी आरक्षण से जुड़े मामले की अंतिम सुनवाई निर्धारित समय पर प्रारंभ नहीं हो सकी, जिससे कार्यवाही में देरी देखी गई। अन्य बेंच उपलब्ध न होने के कारण सुनवाई अंततः शाम लगभग 4:30 बजे शुरू हो पाई, जबकि यह दोपहर 12:30 बजे निर्धारित थी।
सुनवाई के दौरान यह निर्णय लिया गया कि संबंधित याचिका को मुख्य याचिका के रूप में माना जाएगा। इसके साथ ही न्यायालय ने निर्देश दिया कि अन्य सभी याचिकाओं में उपलब्ध दस्तावेज और जवाब इसी मुख्य याचिका में संलग्न किए जाएं, ताकि पूरा रिकॉर्ड एकीकृत रूप से तैयार हो सके और सुनवाई को सरल बनाया जा सके।
कार्यवाही के दौरान यह भी सामने आया कि सरकार की ओर से नियुक्त अधिवक्ता विनायक प्रसाद शाह एक अन्य याचिका में सरकार के विरुद्ध पक्ष रखने की तैयारी कर रहे थे, जिसमें 27 प्रतिशत आरक्षण को अपर्याप्त बताते हुए इसे बढ़ाने की मांग की गई थी। इस पर न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि कोई अधिवक्ता सरकार की ओर से नियुक्त है, तो वह सरकार के विरुद्ध दलील प्रस्तुत नहीं कर सकता।
सुनवाई के दौरान अधिवक्ता वरुण ठाकुर ने न्यायालय को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की याद दिलाई, जिसके अनुसार इस मामले का निपटारा तीन माह के भीतर किया जाना है, जबकि लगभग डेढ़ माह का समय बीत चुका है। इस पर न्यायालय ने सहमति जताते हुए कहा कि वह भी मामले को शीघ्र निपटाना चाहता है, लेकिन समयाभाव के कारण आज विस्तृत सुनवाई संभव नहीं हो सकी।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस प्रकरण की अगली सुनवाई मंगलवार 28 अप्रैल को पूरे समय के लिए की जाएगी। साथ ही निर्देश दिया गया कि उस दिन सुबह 11 बजे से 1:30 बजे तक मामले की विस्तृत सुनवाई होगी। पहले से सूचीबद्ध बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं के बाद ओबीसी आरक्षण मामले पर बहस शुरू होगी।
सुनवाई की शुरुआत में आरक्षण का विरोध करने वाले पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप संचेती और अधिवक्ता आदित्य सांघी अपने तर्क प्रस्तुत करेंगे, जिसके बाद सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एम. नटराजन अपना पक्ष रखेंगे।













