न्यायपालिका
04 Jun, 2026

बरी होने मात्र से पूरे बकाया वेतन का अधिकार नहीं मिलता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का अहम फैसला

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि आपराधिक मामले में बरी हो जाने के बाद भी कर्मचारी को बर्खास्तगी अवधि का पूरा वेतन स्वतः नहीं मिलता, बल्कि यह सेवा परिस्थितियों और तथ्यों के मूल्यांकन पर निर्भर करेगा।

भोपाल, 04 जून।

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की युगल पीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट किया है कि आपराधिक मामले से बरी हो जाने का अर्थ यह कतई नहीं है कि कर्मचारी को सेवा से बाहर रहने की पूरी अवधि का बकाया वेतन (बैक वेजेज) पाने का स्वतः अधिकार मिल जाएगा।

1. मामला क्या था?

याचिकाकर्ता प्रसाद नायक, छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी में सिविल सुपरवाइजर के पद पर कार्यरत थे। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज होने और स्पेशल कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। बाद में कर्मचारी ने उच्च न्यायालय में अपील की और इस बीच वह सेवानिवृत्त भी हो गए। उच्च न्यायालय ने उन्हें दोषमुक्त कर बरी कर दिया। बरी होने के बाद विभाग ने उन्हें 'काल्पनिक रूप से' सेवा में बहाल तो किया, लेकिन बर्खास्तगी से सेवानिवृत्ति तक की अवधि के वेतन और अन्य लाभों का भुगतान करने से इनकार कर दिया।

2. कर्मचारी का तर्क

कर्मचारी का पक्ष यह था कि चूंकि दोषसिद्धि का आधार ही समाप्त हो गया और उन्हें सम्मानपूर्वक बरी किया गया है, इसलिए वे उस पूरी अवधि का वेतन-भत्ता पाने के हकदार हैं, जब वे सेवा से बाहर रहे।

3. उच्च न्यायालय का निर्णय

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवीन्द्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कर्मचारी की अपील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने निर्णय में निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं को आधार बनाया:

  • ‘काम नहीं, तो वेतन नहीं’ का सिद्धांत: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल आपराधिक मामले से बरी हो जाना ही पूरी अवधि का बकाया वेतन पाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।

  • पूर्व प्रभाव का सिद्धांत: बर्खास्तगी की कार्रवाई उस समय प्रभावी और वैध दोषसिद्धि के आधार पर की गई थी। अतः, बाद में अपील में बरी हो जाने से बर्खास्तगी के दौरान उत्पन्न हुए कानूनी परिणामों को पूर्व प्रभाव से स्वतः समाप्त नहीं माना जा सकता।

4. अन्य उच्च न्यायालयों का रुख

यह फैसला अपने आप में अकेला नहीं है। बॉम्बे और रांची उच्च न्यायालय ने भी पूर्व में इसी तरह का दृष्टिकोण अपनाया है। बॉम्बे उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि रिश्वत के मामले में गिरफ्तारी के कारण निलंबित हुए कर्मचारी की पूरी सैलरी का वित्तीय बोझ नियोक्ता (नियोक्ता कंपनी) पर डालना उचित नहीं है।

5. बकाया वेतन की पात्रता: अपवाद और स्थितियां

यह निर्णय हर मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करता है:

  • अनुचित बर्खास्तगी: यदि यह साबित हो जाए कि बर्खास्तगी स्वयं में गैरकानूनी थी, तो कर्मचारी वरिष्ठता सहित सभी परिणामी लाभों का हकदार होता है।

  • मामले दर मामले भिन्नता: राजस्थान उच्च न्यायालय जैसे अन्य मंचों ने कुछ विशिष्ट मामलों में यह माना है कि यदि आरोप आधारहीन थे, तो वेतन रोकना अनुचित हो सकता है।

निष्कर्ष: न्यायालय का स्पष्ट संदेश है कि ‘बरी होना’ और ‘बैक वेजेज का अधिकार’ दो अलग चीजें हैं। वेतन भुगतान के लिए यह अनिवार्य है कि बर्खास्तगी के समय की परिस्थितियों का मूल्यांकन किया जाए। यदि उस समय विभाग की कार्रवाई नियमों के दायरे में थी, तो केवल दोषमुक्त होने के आधार पर विभाग को वित्तीय बोझ उठाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

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