नई दिल्ली, 5 जून।
गुजरात हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि वक्फ संस्थानों को कोर्ट फीस से छूट किस कानूनी आधार पर दी जा सकती है। वक्फ ट्रिब्यूनल में मुकदमों पर लगने वाली भारी फीस को लेकर शुरू हुई यह बहस अब न्याय तक पहुँच की व्यापक चर्चा का विषय बन गई है। गरीब दरगाहों, मस्जिदों और मदरसों के लिए न्याय कहीं महंगा तो नहीं हो रहा, यही मूल प्रश्न है।
न्याय सबके लिए है, पर क्या वह सबके लिए समान रूप से सुलभ भी है? यह सवाल एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर खड़ा है। मुद्दा है वक्फ संस्थानों को वक्फ ट्रिब्यूनल में मुकदमा लड़ने के लिए कोर्ट फीस से छूट देने का। 17 दिसंबर 2025 को गुजरात हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि वक्फ ट्रिब्यूनल में दाखिल मामलों के लिए कोर्ट फीस का भुगतान अनिवार्य है और वक्फ संस्थानों को कोई विशेष छूट प्राप्त नहीं है। इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई। सुनवाई के दौरान जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा की पीठ ने याचिकाकर्ताओं के वकील एजाज मकबूल से सीधा सवाल पूछा कि कोर्ट फीस से छूट का दावा किस कानूनी आधार पर किया जा रहा है? ऐसा कौन-सा कानून है जो वक्फ संस्थानों को यह राहत देता है? वकील ने अगली सुनवाई तक जवाब देने का समय मांगा और मामला 7 अगस्त तक स्थगित हो गया। पर सवाल बड़ा है—क्या धर्मार्थ संस्थाओं के लिए न्याय का दरवाजा महंगा हो जाएगा?
विवाद की जड़ में संपत्ति के मूल्य के आधार पर लगने वाली फीस है। वक्फ एक्ट, 1995 की धारा 83 के तहत प्रत्येक राज्य में वक्फ ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं। इनका काम वक्फ संपत्तियों से जुड़े विवादों का निपटारा करना है। कब्जा, किराया, मुतवल्ली की नियुक्ति जैसे मामलों की सुनवाई यहीं होती है। समस्या यह है कि ट्रिब्यूनल में मामला दाखिल करते समय कोर्ट फीस एक्ट के तहत शुल्क देना पड़ता है। यह शुल्क संपत्ति की कीमत पर आधारित होता है। यदि 20 लाख रुपये की वक्फ संपत्ति पर कब्जे का विवाद है, तो लगभग 1 से 2 लाख रुपये तक फीस देनी पड़ सकती है। बड़ी दरगाहें या शहरी मस्जिदें यह राशि वहन कर सकती हैं, लेकिन गांव की छोटी मस्जिद, कब्रिस्तान या मदरसा इतनी रकम कहां से लाएगा? गुजरात हाई कोर्ट ने माना कि वक्फ एक्ट में कहीं भी फीस माफी का प्रावधान नहीं है, इसलिए ट्रिब्यूनल द्वारा फीस की मांग वैध है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि वक्फ संपत्तियां धर्मार्थ कार्यों के लिए समर्पित होती हैं। उनकी आय अनाथों, विधवाओं और गरीब छात्रों के कल्याण पर खर्च की जाती है। यदि किसी संपत्ति पर अवैध कब्जा हो जाए और उसे छुड़ाने के लिए लाखों रुपये की फीस देनी पड़े, तो वक्फ बोर्ड या स्थानीय समिति मुकदमा ही नहीं लड़ पाएगी। नतीजतन, भू-माफिया कब्जा बनाए रखेंगे। वरिष्ठ वकील एजाज मकबूल ने दलील दी कि धारा 83 के तहत ट्रिब्यूनल में कार्यवाही ‘आवेदन’ से शुरू होती है, ‘वाद’ से नहीं। उनके अनुसार कोर्ट फीस एक्ट वादों पर लागू होता है, आवेदनों पर नहीं, इसलिए फीस नहीं लगनी चाहिए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि यह छूट किस कानून में लिखी है।
जस्टिस नरसिम्हा की पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत भावनाओं से नहीं, कानून से चलती है। यदि वक्फ एक्ट या कोर्ट फीस एक्ट में छूट का प्रावधान है, तो उसे दिखाया जाए। यदि ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, तो संसद कानून बनाए, अदालत स्वयं छूट नहीं दे सकती। यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश में 8.7 लाख से अधिक वक्फ संपत्तियां दर्ज हैं और उनकी कुल अनुमानित कीमत 1.2 लाख करोड़ रुपये से अधिक बताई जाती है। बड़ी संख्या में संपत्तियां विवादों या कथित अवैध कब्जों से जुड़ी हैं। यदि हर मामले में फीस माफ हो जाए, तो ट्रिब्यूनल के संचालन का खर्च कौन वहन करेगा? दूसरी ओर, यदि फीस अनिवार्य रहेगी, तो हजारों छोटी वक्फ इकाइयां न्याय से वंचित हो सकती हैं।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि कई राज्यों में हिंदू धार्मिक संस्थाओं को कोर्ट फीस में रियायत या छूट प्राप्त है। उनका कहना है कि यदि अन्य धर्मार्थ संस्थाओं को राहत मिल सकती है, तो वक्फ संस्थानों को क्यों नहीं? सरकार का जवाब है कि विभिन्न धार्मिक संस्थाओं पर अलग-अलग कानून लागू होते हैं। वक्फ एक्ट, 1995 एक केंद्रीय कानून है और उसमें ऐसी कोई छूट नहीं दी गई है। यदि छूट देनी है, तो संसद को संशोधन करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट के सवाल के बाद वक्फ बोर्डों के सामने कुछ विकल्प हैं। पहला, वे ऐसा कोई नियम, अधिसूचना या परिपत्र प्रस्तुत करें जिसमें फीस छूट का प्रावधान हो। दूसरा, सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 33 के तहत ‘इंडीजन्ट पर्सन’ (निर्धन पक्षकार) की तरह राहत मांगें। तीसरा, केंद्र सरकार से वक्फ एक्ट में संशोधन की मांग करें ताकि छोटी संपत्तियों से जुड़े मामलों में फीस में छूट या रियायत दी जा सके।
सुप्रीम कोर्ट का सवाल पूरी तरह कानूनी है और उसका उत्तर भी कानून में ही तलाशना होगा। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यदि न्याय तक पहुँच अत्यधिक महंगी हो जाए, तो कमजोर और गरीब संस्थाएं अपने अधिकारों की रक्षा नहीं कर पाएंगी। इसलिए समाधान ऐसा होना चाहिए जो न्याय व्यवस्था के वित्तीय संतुलन और गरीब संस्थाओं की पहुँच, दोनों को ध्यान में रखे। आखिरकार, न्याय का मंदिर सबके लिए खुला है, लेकिन उसकी सीढ़ियां इतनी ऊंची भी नहीं होनी चाहिए कि जरूरतमंद वहां तक पहुंच ही न सके। 7 अगस्त की सुनवाई केवल वक्फ संस्थानों की कोर्ट फीस का प्रश्न नहीं तय करेगी, बल्कि यह भी बताएगी कि भारत में सुलभ न्याय की अवधारणा को किस दृष्टि से देखा जाएगा।















