नई दिल्ली, 5 जून ।
सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट किया है कि केवल किसी कर्मचारी को ‘अस्थायी’ या ‘कैज़ुअल’ कहना उसके पेंशन अधिकार को समाप्त नहीं करता, बल्कि लंबे समय तक निरंतर सेवा देने वाले ऐसे कर्मचारियों को पेंशन लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह की पीठ ने भिखानी देवी बनाम भारत संघ मामले में डाक विभाग में वर्षों से कार्यरत अस्थायी और कैज़ुअल कर्मचारियों को पेंशन लाभ देने का आदेश देते हुए इसे ऐतिहासिक निर्णय बताया है।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि केवल ‘अस्थायी’ दर्जा होने से कोई कर्मचारी पेंशन का हकदार होने से अयोग्य नहीं हो जाता, यदि उसने लंबे समय तक नियमित रूप से कार्य किया है तो उसे पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि सेवा की निरंतरता ही पेंशन का वास्तविक आधार है और लंबे समय तक कार्य करने वाले कर्मचारियों को केवल औपचारिक पदनाम के आधार पर बाहर नहीं किया जा सकता।
पीठ के अनुसार पेंशन केवल सेवानिवृत्ति का लाभ नहीं है, बल्कि यह बुजुर्ग कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा और सम्मान से जुड़ा विषय है, इसलिए दशकों तक सेवा देने के बाद किसी को असहाय स्थिति में नहीं छोड़ा जा सकता।
इस निर्णय का प्रभाव डाक विभाग में कार्यरत उन लाखों कैज़ुअल कर्मचारियों पर पड़ेगा, जिनमें सफाईकर्मी, मेल कैरियर और नाइट वॉचमैन शामिल हैं, जिन्होंने लंबे समय से सेवाएं दी हैं।
इसके साथ ही यह सिद्धांत अन्य सरकारी विभागों जैसे रेलवे, पीडब्ल्यूडी और नगर निगमों में कार्यरत अस्थायी कर्मचारियों के लिए भी उदाहरण बनेगा, जिससे व्यापक स्तर पर लाभ मिलने की संभावना है।
न्यायालय के अनुसार जिन कर्मचारियों की पेंशन पहले केवल अस्थायी दर्जे के कारण रोकी गई थी, वे अब बकाया सहित पेंशन का दावा कर सकेंगे, जिससे हजारों मामलों में राहत मिलने की उम्मीद है।
इस फैसले में पूर्व के कई निर्णयों का हवाला दिया गया, जिनमें समान कार्य और समान वेतन तथा सेवा की निरंतरता को पेंशन का आधार माना गया था और इन्हीं सिद्धांतों को दोहराया गया है।
यह निर्णय उन लाखों परिवारों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, जिन्होंने वर्षों तक कम वेतन पर सेवाएं दीं लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद किसी सुरक्षा के बिना रह गए थे।














