नई दिल्ली, 9 जुलाई।
ईपीएफओ यानी कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के हालिया बदलावों से देश के करोड़ों कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन अधिसूचना सामने आने के बाद निराशा हाथ लगी। केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की ओर से जारी नए नियमों में कर्मचारी भविष्य निधि, कर्मचारी पेंशन योजना और कर्मचारी जमा-आधारित बीमा से जुड़े प्रावधानों को सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के अनुरूप ढालने की बात कही गई है, लेकिन इसमें न तो न्यूनतम पेंशन बढ़ाई गई और न ही वेतन सीमा में कोई बदलाव किया गया। इसके बाद संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के बीच यह सवाल उठने लगा है कि बढ़ती महंगाई के दौर में 700 से 2000 रुपये तक की मासिक पेंशन से कोई परिवार कैसे गुजारा कर सकता है।
पहले से गठित एक विशेषज्ञ समिति ने सरकार को सिफारिश दी थी कि ईपीएस-95 के तहत न्यूनतम पेंशन कम से कम 10,000 रुपये प्रतिमाह होनी चाहिए, ताकि सेवानिवृत्त व्यक्ति और उसका परिवार सम्मानजनक जीवन जी सके। ईपीएफओ के केंद्रीय न्यासी बोर्ड ने चार महीने पहले सामाजिक सुरक्षा संहिता के प्रावधानों को लागू करने की मंजूरी दी थी। यह प्रक्रिया कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 और कर्मचारी भविष्य निधि एवं विविध प्रावधान अधिनियम, 1952 सहित नौ पुराने कानूनों को एकीकृत करने का हिस्सा है। देश में ईपीएफओ के लगभग आठ करोड़ सदस्य हैं और इनके परिवारों पर इन नियमों का सीधा असर पड़ता है, लेकिन इस बार के बदलाव केवल प्रक्रियात्मक हैं, ढांचागत नहीं।
सबसे बड़ा झटका पेंशनभोगियों को लगा है। ईपीएफओ की वर्ष 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार संगठन के 81.5 लाख पेंशनभोगियों में से लगभग 36.8 लाख लोगों को हर महीने 1,000 रुपये या उससे भी कम पेंशन मिलती है। कुछ को 700 रुपये, कुछ को 900 रुपये और अधिकतम 2,000 रुपये तक की पेंशन मिलती है। आज के समय में यह राशि एक परिवार के बुनियादी खर्च के लिए भी पर्याप्त नहीं है। दवाइयों, बिजली, किराए और अन्य आवश्यकताओं के बीच इतनी कम पेंशन को पेंशनभोगी संगठन अपमानजनक बताते हैं।
पेंशनभोगियों और श्रम संगठनों को उम्मीद थी कि इस बार 12 वर्षों से चली आ रही 15,000 रुपये की वेतन सीमा और 1,000 रुपये की न्यूनतम पेंशन में बदलाव होगा, लेकिन सरकार ने दोनों मुद्दों पर चुप्पी साध ली। जबकि महंगाई लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2014 में जो वस्तुएं 100 रुपये में मिलती थीं, आज उनकी कीमत लगभग दोगुनी हो चुकी है। ऐसे में 1,000 रुपये की मासिक पेंशन वास्तविक जरूरतों के सामने बेहद कम साबित होती है।
सरकार का तर्क है कि ईपीएस योजना पर वित्तीय भार बहुत अधिक है और पेंशन बढ़ाने के लिए बड़े बजट की आवश्यकता होगी। वर्तमान में सरकार ईपीएस के तहत प्रतिवर्ष लगभग 11,000 करोड़ रुपये खर्च करती है। इसके अतिरिक्त लगभग 20.6 लाख गरीब पेंशनभोगियों के लिए अनुदान के रूप में करीब 1,000 करोड़ रुपये भी दिए जाते हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार इच्छाशक्ति दिखाए तो सामाजिक सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए इस व्यय में बढ़ोतरी की जा सकती है।
उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति ने यह भी सुझाव दिया था कि न्यूनतम पेंशन को पहले 3,000 रुपये और बाद में चरणबद्ध तरीके से 10,000 रुपये तक बढ़ाया जाए। साथ ही महंगाई सूचकांक के आधार पर हर वर्ष पेंशन में संशोधन किया जाए। दुर्भाग्य से यह सिफारिश अब तक लागू नहीं हो सकी। पेंशनभोगी संगठन कई बार प्रदर्शन कर चुके हैं और सरकार को ज्ञापन भी सौंप चुके हैं, लेकिन ठोस निर्णय अब भी प्रतीक्षित है।
आम कर्मचारियों की नाराजगी का एक कारण यह भी है कि वेतन सीमा अब भी 15,000 रुपये ही बनी हुई है, जबकि निजी क्षेत्र में आज अधिकांश कर्मचारियों का मूल वेतन इससे कहीं अधिक है। परिणामस्वरूप वे ईपीएफ में अपनी वास्तविक आय के अनुरूप योगदान नहीं कर पाते और सेवानिवृत्ति के बाद उनकी बचत भी सीमित रह जाती है।
भारत युवा आबादी वाला देश है, लेकिन सामाजिक सुरक्षा का ढांचा अभी भी अपेक्षित स्तर तक मजबूत नहीं बन पाया है। विकसित देशों में सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली न्यूनतम पेंशन व्यक्ति को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का आधार देती है। भारत में भी समय की मांग है कि न्यूनतम पेंशन को यथार्थवादी बनाया जाए। सरकार को महंगाई और जीवन-यापन की लागत को ध्यान में रखते हुए न्यूनतम पेंशन पर पुनर्विचार करना चाहिए, वेतन सीमा बढ़ानी चाहिए और ईपीएफओ को अधिक पारदर्शी बनाना चाहिए। केवल प्रक्रियात्मक बदलाव पर्याप्त नहीं होंगे। वास्तविक सुधार वही होंगे, जिनसे कर्मचारी को सेवानिवृत्ति के बाद सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन मिल सके।















