भोपाल, 5 जून।
मध्यप्रदेश लोकायुक्त की टीम ने एक ही दिन में पांच जिलों में कार्रवाई कर पांच रिश्वतखोरों को रंगे हाथ गिरफ्तार किया। शहडोल में तहसील का बाबू, जबलपुर में राजस्व निरीक्षक, मंदसौर में वन विभाग का कर्मचारी, टीकमगढ़ में पटवारी और बड़वानी में आंगनबाड़ी सहायिका की नियुक्ति व मानदेय से जुड़े मामले में आरोपी पकड़े गए। यह उपलब्धि जितनी उत्साहजनक दिखती है, उतनी ही चिंताजनक भी है।
इन सभी मामलों में एक समानता है। रिश्वत मांगने वाले बड़े अधिकारी नहीं, बल्कि वे कर्मचारी हैं जिनका सीधा संपर्क आम नागरिकों से होता है। जमीन का सीमांकन, मानदेय जारी करना, अतिक्रमण संबंधी कार्रवाई या प्रशासनिक अनुमोदन जैसे नियमित कार्यों के लिए रिश्वत मांगी गई। यह संकेत देता है कि भ्रष्टाचार अब व्यक्तिगत लालच से आगे बढ़कर व्यवस्था का हिस्सा बनता जा रहा है।
लोकायुक्त की कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन यह उपचार है, स्थायी समाधान नहीं। यदि एक दिन में पांच स्थानों पर ऐसे मामले सामने आते हैं, तो स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि बाकी जिलों और बाकी दिनों में स्थिति क्या होगी? अधिकांश पीड़ित शिकायत दर्ज कराने तक नहीं पहुंच पाते, क्योंकि उन्हें काम रुकने, समय बर्बाद होने या प्रताड़ना का डर रहता है।
भ्रष्टाचार की जड़ तीन कारणों में दिखाई देती है—विवेकाधीन शक्तियां, प्रक्रियाओं में अपारदर्शिता और दंड का कमजोर भय। जब किसी कर्मचारी के पास फाइल रोकने या निर्णय टालने की क्षमता होती है, तब रिश्वत की गुंजाइश पैदा होती है।
समाधान भी स्पष्ट हैं। अधिकतम सरकारी सेवाओं को समय-सीमा के साथ ऑनलाइन किया जाए, प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाया जाए और भ्रष्टाचार के मामलों में त्वरित सुनवाई सुनिश्चित हो। केवल छापों से नहीं, बल्कि व्यवस्था में सुधार से ही घूसखोरी पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है। नागरिक को यह भरोसा होना चाहिए कि उसका वैध काम बिना रिश्वत और बिना सिफारिश के समय पर होगा।














