ओरछा, 12 जून।
बुंदेलखंड की राजनीति में इन दिनों महेश केवट का नाम चर्चा में है। निवाड़ी की ओरछा नगर परिषद के दो बार पार्षद रहे महेश का राजनीतिक दायरा भले अभी स्थानीय स्तर तक सीमित हो, लेकिन यदि भाजपा उन्हें राज्यसभा भेजती है तो यह बड़ा राजनीतिक संदेश होगा। मध्यप्रदेश के इतिहास में पहली बार केवट, मांझी, मल्लाह, रैकवार और भोई समाज को संसद में सीधा प्रतिनिधित्व मिल सकता है। इससे उत्तरप्रदेश और बिहार तक भाजपा की सामाजिक इंजीनियरिंग को नई दिशा मिलने की संभावना है।
महेश केवट की पत्नी भाजपा प्रत्याशी के रूप में ओरछा नगर परिषद अध्यक्ष का चुनाव हार चुकी हैं, लेकिन यदि पार्टी महेश पर दांव लगाती है तो यह संदेश जाएगा कि भाजपा में अवसर परिवार नहीं, बल्कि कार्यकर्ता को मिलता है। दो बार का पार्षद सीधे राज्यसभा पहुंचे, तो यह बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं के लिए भी प्रेरक उदाहरण बन सकता है।
राजनीतिक दृष्टि से असली महत्व मध्यप्रदेश से अधिक उत्तरप्रदेश और बिहार का माना जा रहा है, जहां निषाद समाज प्रभावशाली भूमिका निभाता है। महेश केवट को राज्यसभा भेजकर भाजपा सामाजिक प्रतिनिधित्व का नया संदेश देने के साथ-साथ विपक्ष के अति-पिछड़ा वर्ग समीकरण को चुनौती देने की रणनीति अपना सकती है।
हालांकि इस दांव के अपने जोखिम भी हैं। महेश केवट का जनाधार अभी मुख्यतः ओरछा-निवाड़ी क्षेत्र तक सीमित माना जाता है। प्रदेश के अन्य ओबीसी नेताओं में असंतोष की संभावना भी जताई जा सकती है। उनकी पत्नी की चुनावी हार को भी विरोधी राजनीतिक मुद्दा बना सकते हैं। इसके बावजूद भाजपा इसे हार के बाद भी कार्यकर्ता के सम्मान और संगठन आधारित राजनीति के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर सकती है। यदि ऐसा होता है तो यह निर्णय केवल एक राज्यसभा सीट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि व्यापक राजनीतिक संदेश का माध्यम बन सकता है।












