भोपाल, 12 जून।
गांव की सरकार यानी पंचायत अब भाई-भतीजावाद के दाग से मुक्त होने जा रही है। मध्यप्रदेश सरकार ने नई गाइडलाइन जारी कर साफ कर दिया है कि अब पंचायत में सचिव के पद पर सरपंच या उपसरपंच के रिश्तेदार नहीं बैठ पाएंगे। यदि कोई सचिव पहले से पद पर है और बाद में उसके परिवार का सदस्य सरपंच बन जाता है तो सचिव का तबादला कर दिया जाएगा। यह फैसला केवल एक प्रशासनिक नियम नहीं, बल्कि ग्रामीण लोकतंत्र की रीढ़ को मजबूत करने का प्रयास है।
पंचायत सचिव पूरे ग्राम पंचायत का प्रशासनिक केंद्र होता है। 14वें और 15वें वित्त आयोग की राशि, मनरेगा भुगतान, जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र, प्रधानमंत्री आवास योजना की सूची और राशन पात्रता जैसी लगभग हर महत्वपूर्ण फाइल सचिव के हस्ताक्षर से गुजरती है। सरपंच नीतिगत मुखिया होता है, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था सचिव के हाथ में होती है। अब तक कई जगहों पर सरपंच अपने बेटे, भतीजे, दामाद या अन्य रिश्तेदार को सचिव बनवा देते थे और फिर पंचायत का संचालन निजी हितों के अनुसार होता था। पात्रता सूची से लेकर मनरेगा और निर्माण कार्यों तक में पक्षपात और अनियमितताओं की शिकायतें आम थीं। शिकायत करने पर जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डाल दी जाती थी और आम नागरिक चक्कर काटता रह जाता था।
नई गाइडलाइन ने इसी रिश्तेदारी आधारित गठजोड़ पर रोक लगाने का प्रयास किया है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने स्पष्ट किया है कि सचिव और सरपंच के बीच खून का रिश्ता, वैवाहिक संबंध या निकट संबंध नहीं होना चाहिए। यदि चुनाव के बाद ऐसा संबंध बनता है तो 15 दिन के भीतर सचिव का तबादला किया जाएगा।
इस व्यवस्था का पहला प्रभाव जवाबदेही पर दिखाई दे सकता है। जब सचिव सरपंच का रिश्तेदार नहीं होगा तो किसी गलत निर्णय पर हस्ताक्षर करने से पहले अधिक सावधानी बरतेगा। पंचायत में चेक एंड बैलेंस की व्यवस्था मजबूत होगी। गरीब और जरूरतमंद व्यक्ति भी बिना राजनीतिक दबाव के अपनी समस्या सचिव तक पहुंचा सकेगा। जन्म प्रमाणपत्र, प्रधानमंत्री आवास योजना की किस्त और मनरेगा भुगतान जैसी सेवाओं में पारदर्शिता और समयबद्धता आने की संभावना बढ़ेगी। आरटीआई के तहत भी सचिव की जवाबदेही अधिक स्पष्ट होगी क्योंकि उसकी नौकरी किसी रिश्तेदारी नहीं, बल्कि उसके कार्य पर निर्भर होगी।
नई गाइडलाइन का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष महिला सशक्तिकरण है। पंचायत सचिव भर्ती में महिलाओं को विशेष वरीयता देने की बात कही गई है। मध्यप्रदेश में लगभग 50 प्रतिशत पंचायतों में महिला सरपंच हैं, लेकिन सचिव पदों पर पुरुषों का वर्चस्व है। कई स्थानों पर "सरपंच पति" ही वास्तविक निर्णय लेते हैं। यदि सचिव पद पर अधिक महिलाएं आएंगी तो महिला सरपंचों को प्रशासनिक सहयोग मिलेगा और गांव की महिलाओं को भी अपनी समस्याएं रखने में सहजता होगी। विधवा पेंशन, लाड़ली लक्ष्मी और प्रसूति सहायता जैसी योजनाओं के क्रियान्वयन में संवेदनशीलता बढ़ सकती है। सरकार का लक्ष्य अगले दो वर्षों में 40 प्रतिशत सचिव पदों पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना है।
हालांकि केवल नियम बना देने से व्यवस्था नहीं बदलती। सबसे बड़ी चुनौती तबादला प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाए रखने की होगी। यह सुनिश्चित करना होगा कि तबादले उद्योग का रूप न लें। इसके लिए पारदर्शी और यादृच्छिक सॉफ्टवेयर आधारित स्थानांतरण प्रणाली आवश्यक होगी। साथ ही केवल प्रत्यक्ष रिश्तेदारों तक सीमित रहने के बजाय आर्थिक साझेदारी और परोक्ष प्रभाव वाले संबंधों को भी नियमों के दायरे में लाना होगा।
महिला वरीयता के साथ गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण भी जरूरी है। कंप्यूटर संचालन, लेखांकन, जीईएम पोर्टल और डिजिटल प्रशासन की अनिवार्य ट्रेनिंग के बिना कोई भी सचिव प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाएगा। अन्यथा नई नियुक्तियां भी केवल औपचारिकता बनकर रह जाएंगी।
ग्रामीण शासन व्यवस्था को वास्तव में मजबूत करने के लिए तीन और कदम आवश्यक हैं। प्रत्येक पंचायत में नागरिक अधिकार पत्र प्रदर्शित किया जाए, जिसमें हर सेवा की समय-सीमा स्पष्ट हो। सभी भुगतान और योजनाओं को डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाए, ताकि पारदर्शिता बढ़े और दलाली की गुंजाइश कम हो। साथ ही सामाजिक अंकेक्षण को प्रभावी बनाते हुए ग्राम सभा में प्रत्येक खर्च का सार्वजनिक लेखा-जोखा प्रस्तुत किया जाए।
महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है। यदि गांव की व्यवस्था भाई-भतीजावाद में उलझ जाए तो लोकतंत्र कमजोर पड़ जाता है। पंचायत सचिव भर्ती की नई गाइडलाइन उसी लोकतंत्र को नई ऊर्जा देने की कोशिश है। सरपंच और सचिव का रिश्ता मालिक और अधीनस्थ का नहीं, बल्कि सहयोगी और जवाबदेह व्यवस्था का होना चाहिए। जब रिश्तेदारी की जगह जिम्मेदारी लेगी, तभी योजनाओं का लाभ सही व्यक्ति तक पहुंचेगा और ग्राम स्वराज की अवधारणा मजबूत होगी।
यह गाइडलाइन केवल तबादले का आदेश नहीं, बल्कि गांव की चौपाल पर लिखा गया एक नया प्रशासनिक सिद्धांत है। इसका पहला संदेश है कि पंचायत किसी परिवार की नहीं, जनता की है और दूसरा संदेश यह कि सचिव किसी व्यक्ति का नहीं, संविधान और कानून का प्रतिनिधि है। यदि यही भावना जमीन पर उतरी तो आने वाले वर्षों में मध्यप्रदेश की पंचायतें सुशासन और पारदर्शिता की नई मिसाल बन सकती हैं और विकसित भारत की कहानी वास्तव में गांव की चौपाल से लिखी जाएगी।













