भोपाल, 10 जून।
मध्यप्रदेश में रोज 42 लोग अपनी जान दे रहे हैं। वर्ष 2024 में 15,491 लोगों ने आत्महत्या की, यानी हर घंटे लगभग दो मौतें। देश की कुल आत्महत्याओं में 9 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ मध्यप्रदेश तीसरे स्थान पर है। पहले स्थान पर महाराष्ट्र और दूसरे पर तमिलनाडु है। सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि छह साल पहले, 2019 में राज्य सरकार ने मानसिक स्वास्थ्य नीति बनाई थी, जो आज तक लागू नहीं हो सकी। न काउंसलिंग सेंटर बने, न हेल्पलाइन शुरू हुई। मौतों का यह आंकड़ा सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता का शवपत्र है।
एनसीआरबी की 2024 की रिपोर्ट बताती है कि आत्महत्या अब किसी एक वर्ग की समस्या नहीं रही। प्रदेश छात्र आत्महत्या के मामलों में देश में तीसरे स्थान पर है। वर्ष 2024 में 716 छात्रों और 731 छात्राओं ने अपनी जान दी। कोटा की तर्ज पर इंदौर, भोपाल और ग्वालियर में प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव, नीट-जेईई में असफलता और माता-पिता की अपेक्षाएं बच्चों को निगल रही हैं।
गृहिणियों की आत्महत्या के मामलों में भी मध्यप्रदेश शीर्ष तीन राज्यों में शामिल है। अकेले 2024 में 2,296 गृहिणियों ने जान दी। दहेज, घरेलू हिंसा, आर्थिक तंगी और अकेलापन इसके प्रमुख कारण हैं। किसान आत्महत्या के मामलों में प्रदेश चौथे स्थान पर है। 1,447 किसानों ने फसल बर्बादी, कर्ज और सरकारी मुआवजे में देरी से परेशान होकर आत्महत्या की।
सबसे चिंताजनक स्थिति सरकारी कर्मचारियों की है। वर्ष 2024 में 324 कर्मचारियों ने आत्महत्या की। काम का दबाव, तबादले, उत्पीड़न और भ्रष्टाचार के आरोपों का मानसिक बोझ कई लोगों के लिए असहनीय साबित हो रहा है। यानी खेत से लेकर कक्षा तक, घर से लेकर दफ्तर तक निराशा का अंधेरा फैल चुका है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि छह साल पहले बनी मानसिक स्वास्थ्य नीति आज भी फाइलों में क्यों दबी हुई है? 2019 में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 के अनुरूप मध्यप्रदेश ने भी राज्य मानसिक स्वास्थ्य नीति बनाई थी। वादा किया गया था कि हर जिले में काउंसलिंग सेंटर स्थापित होंगे, स्कूल-कॉलेजों में मेंटल हेल्थ कार्यक्रम चलेंगे, 24x7 हेल्पलाइन शुरू होगी और पंचायत स्तर तक जागरूकता अभियान पहुंचाया जाएगा। लेकिन छह वर्ष बीत जाने के बाद भी जमीन पर इनका कोई प्रभाव दिखाई नहीं देता।
स्वास्थ्य विभाग बजट और संसाधनों की कमी का हवाला देता है, जबकि प्रदेश में मनोचिकित्सकों की भारी कमी है। आवश्यकता के अनुसार प्रत्येक 2,300 लोगों पर एक मनोचिकित्सक होना चाहिए, लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि लगभग 20 लाख की आबादी पर एक विशेषज्ञ उपलब्ध है। जिला अस्पतालों में 'मन कक्ष' के नाम पर कमरे तो हैं, लेकिन न पर्याप्त स्टाफ है और न ही आवश्यक सुविधाएं। स्कूलों और कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू ही नहीं हो सके हैं। छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी काउंसलिंग को मानसिक विक्षिप्तता का इलाज समझा जाता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जब नीति बन चुकी थी तो उसे लागू क्यों नहीं किया गया? क्या 15,491 मौतें भी सरकार और प्रशासन को जगाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं? यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि गंभीर गैर-जिम्मेदारी का उदाहरण प्रतीत होती है।
मध्यप्रदेश तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से बहुत कुछ सीख सकता है। तमिलनाडु आत्महत्या के मामलों में दूसरे स्थान पर होने के बावजूद 'इमरजेंसी केयर एंड रिकवरी सेंटर' मॉडल के माध्यम से 2018 से 2023 के बीच लगभग 12 प्रतिशत कमी लाने में सफल रहा। वहां हर मेडिकल कॉलेज में सुसाइड प्रिवेंशन क्लिनिक संचालित हैं। महाराष्ट्र ने 'प्रेरणा प्रोजेक्ट' के जरिए किसानों के लिए टोल-फ्री हेल्पलाइन और गांव-गांव में मेंटल हेल्थ मित्र तैयार किए हैं। केरल ने 'आश्वास' कार्यक्रम के अंतर्गत स्कूलों में काउंसलर नियुक्त कर छात्रों को समय रहते मानसिक सहयोग उपलब्ध कराया।
इसके विपरीत मध्यप्रदेश के पास न प्रभावी हेल्पलाइन है और न ही गांव स्तर पर कोई संगठित मानसिक स्वास्थ्य सहायता तंत्र। इंदौर और भोपाल जैसे बड़े शहरों में भी सरकारी काउंसलिंग सेंटर गिने-चुने हैं। इंदौर जैसे शहर, जहां आत्महत्या की दर चिंताजनक है, वहां तक भी राज्य की मानसिक स्वास्थ्य नीति प्रभावी रूप से नहीं पहुंच सकी है।
अब केवल नीति बनाना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसे धरातल पर उतारना अनिवार्य है। जिला स्तर पर आत्महत्या रोकथाम टास्क फोर्स बनाई जानी चाहिए, जिसमें कलेक्टर की अध्यक्षता में पुलिस, स्वास्थ्य, शिक्षा और कृषि विभाग के अधिकारी शामिल हों। हर आत्महत्या का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कर उसके कारणों का अध्ययन और सार्वजनिक डेटा तैयार किया जाना चाहिए।
आशा कार्यकर्ताओं, एएनएम और शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण देकर तनाव के शुरुआती संकेत पहचानने और जरूरतमंद लोगों को विशेषज्ञों तक पहुंचाने की व्यवस्था विकसित की जा सकती है। 24 घंटे चलने वाली टोल-फ्री मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन शुरू की जानी चाहिए, जहां प्रशिक्षित काउंसलर गोपनीय तरीके से सहायता उपलब्ध कराएं। स्कूलों और कॉलेजों में जीवन कौशल और भावनात्मक संतुलन पर नियमित पाठ्यक्रम शुरू किए जाएं, ताकि बच्चे असफलता, अवसाद और रिश्तों से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना सीख सकें।
सरकार के साथ समाज की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। आत्महत्या को कायरता या पाप कहकर हम पीड़ित व्यक्ति को और अधिक अकेला कर देते हैं। अवसाद एक बीमारी है, कमजोरी नहीं। जिस तरह बुखार होने पर डॉक्टर के पास जाना सामान्य माना जाता है, उसी तरह मानसिक तनाव होने पर काउंसलर या मनोचिकित्सक के पास जाने में भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए। परिवारों को बच्चों के अंकों से अधिक उनके मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना होगा और रिश्तों में संवाद को मजबूत बनाना होगा।
रोज 42 मौतों का अर्थ है कि हर दिन 42 परिवार हमेशा के लिए टूट रहे हैं। इनमें छात्र हैं, जो देश का भविष्य थे; गृहिणियां हैं, जो परिवार की धुरी थीं; किसान हैं, जो अन्नदाता हैं; और कर्मचारी हैं, जो व्यवस्था का आधार हैं। राज्य की मानसिक स्वास्थ्य नीति को अलमारी से निकालकर जमीन पर उतारना अब विकल्प नहीं, बल्कि समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यदि आज भी हमने इस संकट को गंभीरता से नहीं लिया, तो आने वाले वर्षों में आंकड़े और भयावह होंगे और हमारी सामूहिक चुप्पी भी इन मौतों की जिम्मेदार मानी जाएगी।
















