नई दिल्ली, 15 जून।
भारतीय इतिहास में 15 जून का दिन अत्यंत दुखद स्मृति के रूप में दर्ज है। वर्ष 1947 में इसी दिन देश के विभाजन की प्रक्रिया ने एक निर्णायक मोड़ लिया था, जब कांग्रेस ने नई दिल्ली में आयोजित अपने विशेष अधिवेशन में बंटवारे के प्रस्ताव पर अपनी औपचारिक मुहर लगा दी थी।
यह बंटवारा मात्र एक भौगोलिक रेखा का खिंचना नहीं था, बल्कि यह करोड़ों लोगों की भावनाओं और जिंदगियों पर गहरा घाव साबित हुआ। सदियों से भाईचारे के साथ रहने वाले समुदाय अचानक दो हिस्सों में बंट गए, जिससे उपमहाद्वीप पर विस्थापन और हिंसा का भयावह दौर शुरू हुआ।
स्वतंत्रता की प्राप्ति जहां भारत और पाकिस्तान के रूप में दो नए राष्ट्रों के उदय का कारण बनी, वहीं विभाजन का दर्द लाखों परिवारों के लिए कभी न भरने वाला घाव छोड़ गया। लाखों लोगों को अपना घर-बार छोड़कर पलायन करना पड़ा और सांप्रदायिक दंगों में अनगिनत जिंदगियां खत्म हो गईं।
इतिहासकारों की नजर में यह मानवीय त्रासदी इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक है। 15 जून 1947 का दिन उस राजनीतिक विवशता का साक्षी है, जिसने देश की एकता के ताने-बाने को झकझोर कर रख दिया था।
आज भी यह तारीख उस संघर्ष और विस्थापन की याद दिलाती है, जिसे भारत की आजादी के साथ सहना पड़ा था। विभाजन की इन स्मृतियों में उन लोगों की पीड़ा छिपी है, जिन्होंने 15 अगस्त 1947 की आजादी को एक ऐसे दर्द के साथ देखा था जिसने पीढ़ियों को प्रभावित किया।













