भोपाल, 5 जून ।
पेट्रोल-डीजल के बाद अब कमर्शियल एलपीजी (एलपीजी) गैस की बढ़ती कीमतें आम आदमी की थाली पर सीधा असर डाल रही हैं। होटल, रेस्तरां, ढाबों और ठेलों पर मिलने वाला भोजन लगातार महंगा होता जा रहा है। मार्च से जून 2026 के बीच 19 किलो वाले कमर्शियल सिलेंडर की कीमत 1773.50 रुपये से बढ़कर 3116.50 रुपये तक पहुँच गई है। यानी मात्र तीन माह में 1343 रुपये अथवा लगभग 76 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है।
शहरों में हर महीने बड़ी संख्या में कमर्शियल सिलेंडरों की खपत होती है। ऐसे में कीमतों में यह उछाल सीधे छोटे व्यापारियों की लागत बढ़ा रहा है। जो ढाबा संचालक पहले दो सिलेंडरों पर लगभग 3547 रुपये खर्च करता था, उसे अब 6233 रुपये चुकाने पड़ रहे हैं। अतिरिक्त बोझ की भरपाई के लिए व्यापारियों के सामने केवल तीन विकल्प हैं—कीमत बढ़ाना, गुणवत्ता घटाना या कारोबार बंद करना। अधिकांश ने कीमत बढ़ाने का रास्ता चुना है। परिणामस्वरूप चाय, नाश्ता और भोजन की कीमतें बढ़ने लगी हैं।
सरकार यह तर्क दे सकती है कि घरेलू 14.2 किलो वाले सिलेंडर की कीमत स्थिर है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आम जनता प्रभावित नहीं हो रही है। मजदूर, छात्र, कर्मचारी और वे सभी लोग जो नियमित रूप से बाहर भोजन करते हैं, बढ़ी हुई लागत का बोझ उठा रहे हैं। ब्रेड, नमकीन, मिठाई और अन्य खाद्य उत्पादों के निर्माण में भी कमर्शियल गैस का उपयोग होता है। ऐसे में उत्पादन लागत बढ़ने का असर अंततः उपभोक्ताओं तक पहुँचना तय है।
कमर्शियल गैस की बढ़ती कीमतें केवल होटल उद्योग का विषय नहीं हैं। इसका प्रभाव खाद्य महंगाई, रोजगार और छोटे कारोबारों पर भी पड़ता है। सरकार को कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव रोकने के लिए स्थिरता-आधारित नीति अपनानी चाहिए। लगातार बढ़ती लागत छोटे व्यापारियों की कमर तोड़ रही है।
रसोई गैस के दामों में 76 प्रतिशत की वृद्धि केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की थाली पर बढ़ता बोझ है। यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो महंगाई की यह आग हर घर तक पहुँचेगी।














