13 अप्रैल।
मध्यप्रदेश एक ओर कृषि उत्पादन में निरंतर प्रगति कर रहा है, वहीं दूसरी ओर कृषि-आधारित उद्योग, विशेषकर राइस मिलिंग सेक्टर, गंभीर संकट का सामना कर रहा है। राज्य सरकार ने किसानों को उत्पादन बढ़ाने हेतु विभिन्न सुविधाएँ उपलब्ध कराई हैं और धान उत्पादन में प्रदेश को अग्रणी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्ष 2024-25 में लगभग 1800 से अधिक राइस मिलों की स्थापना में सरकारी सहयोग, सब्सिडी और प्रोत्साहन योजनाओं ने इस क्षेत्र में निवेश को आकर्षित किया। किंतु 2026 तक आते-आते यही क्षेत्र नीतिगत अस्पष्टता और प्रशासनिक देरी के कारण अस्तित्व के संकट में पहुँच गया है।
सरकार द्वारा मिलिंग नीति के अंतर्गत भारतीय खाद्य निगम में चावल जमा करने पर मिलरों को अपग्रेडेशन राशि देने का प्रावधान किया गया था, जिसका उल्लेख नीति की कंडिका 21 में है। परंतु 2024 से अब तक इस संबंध में कोई स्पष्ट आदेश जारी नहीं हुआ। परिणामस्वरूप मिलरों को अपेक्षित वित्तीय सहायता नहीं मिल सकी, जिससे उनकी कार्यशील पूंजी पर दबाव बढ़ा है। यह स्थिति नीति और उसके क्रियान्वयन के बीच गंभीर अंतर को दर्शाती है।
मिलरों ने बैंक ऋण लेकर और निजी संपत्तियाँ गिरवी रखकर उद्योग स्थापित किए थे। वर्तमान परिस्थितियों में वे न केवल अपने ऋण चुकाने में असमर्थ हो रहे हैं, बल्कि डिफॉल्टर घोषित होने की कगार पर हैं। मिलरों की वित्तीय स्थिति कमजोर होने के कारण वे वर्ष 2025-26 में धान की मिलिंग में रुचि नहीं ले रहे हैं, जिससे आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो रही है।
मिलिंग में देरी के कारण बड़ी मात्रा में धान खुले में भंडारित है। मानसून के आगमन के साथ इसके सड़ने का खतरा बढ़ गया है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त, सरकार को प्रति माह लगभग 200 करोड़ रुपये का अतिरिक्त व्यय वहन करना पड़ रहा है।
मिलरों ने अपनी समस्याएँ राज्य के शीर्ष नेतृत्व और संबंधित मंत्रियों के समक्ष रखी हैं, किंतु समाधान की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए। यदि समय रहते मिलिंग नीति के लंबित प्रावधानों को लागू नहीं किया गया और मिलरों को वित्तीय राहत नहीं दी गई, तो यह उद्योग व्यापक स्तर पर प्रभावित होगा।