30 अप्रैल।
देश भर में आम आदमी को बेहतर परिवहन सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए नियम तो बहुत बनते हैं, सुरक्षा के लिए अरबों रुपए खर्च भी किए जा रहे हैं, लेकिन सड़क हादसों में मौतों के आंकड़े भयावह होते जा रहे हैं। आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है? मध्य प्रदेश में हाल ही में स्लीपर बसों में आग लगने की लगातार घटनाएं परिवहन व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर कर रही हैं। देवास-भोपाल हाईवे पर नेवरी फाटा के पास हुई ताजा घटना, जिसमें डीजल लीकेज की चेतावनी के बावजूद बस को नहीं रोका गया और बाद में विस्फोट हो गया, यह दर्शाती है कि जिम्मेदार विभाग किस हद तक लापरवाह बना हुआ है। करीब 40 यात्रियों ने खिड़कियों के कांच तोड़कर अपनी जान बचाई—यह किसी चमत्कार से कम नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
यह कोई एकल घटना नहीं है। इससे पहले मक्सी-शाजापुर मार्ग पर भी एक बस कुछ ही मिनटों में जलकर खाक हो गई थी। बीते कुछ महीनों में राज्य में दर्जनों स्लीपर बसों में आगजनी की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। हर बार हादसे के बाद परिवहन विभाग सक्रियता दिखाता है, चेकिंग अभियान चलाए जाते हैं और सख्ती के दावे किए जाते हैं, लेकिन यह सक्रियता अल्पकालिक साबित होती है। कुछ दिनों बाद स्थिति फिर जस की तस हो जाती है।
मुख्य सवाल यह है कि आखिर इन बसों को फिटनेस सर्टिफिकेट और परमिट किस आधार पर जारी किए जा रहे हैं। यदि बसों में तकनीकी खामियां, सुरक्षा मानकों की अनदेखी और आपातकालीन निकास की कमी है, तो यह सीधे-सीधे विभागीय निगरानी की विफलता है। नियमों के अनुसार सिंगल गेट वाली स्लीपर बसों पर प्रतिबंध की बात पहले ही कही जा चुकी है, लेकिन हकीकत में ये बसें बिना रोक-टोक सड़कों पर दौड़ रही हैं। परिवहन विभाग की भूमिका केवल हादसे के बाद कार्रवाई करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए; वास्तविक जिम्मेदारी हादसों को रोकने की है, जिसके लिए नियमित और निष्पक्ष निरीक्षण, सख्त फिटनेस जांच और नियमों के उल्लंघन पर कठोर दंड अनिवार्य है। लेकिन वर्तमान स्थिति यह संकेत देती है कि या तो नियमों का पालन नहीं हो रहा है या फिर जानबूझकर अनदेखी की जा रही है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि निजी बस ऑपरेटरों पर प्रभावी नियंत्रण का अभाव है। यदि विभाग समय पर तकनीकी निरीक्षण और सुरक्षा मानकों की पुष्टि सुनिश्चित करे, तो ऐसी घटनाओं को काफी हद तक रोका जा सकता है। लेकिन बार-बार हो रही घटनाएं यह साबित करती हैं कि व्यवस्था प्रतिक्रियात्मक बन गई है। इन हादसों की जिम्मेदारी केवल बस संचालकों पर डालकर विभाग खुद को नहीं बचा सकता। जब तक फिटनेस प्रमाणन, परमिट प्रक्रिया और निगरानी प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं लाई जाती, तब तक आम जनता की सुरक्षा खतरे में बनी रहेगी।
अब जरूरत है कड़े और स्थायी सुधारों की, ताकि सड़कों पर चलने वाली हर बस यात्रियों के लिए सुरक्षित हो, न कि एक चलती हुई दुर्घटना। भारत सरकार के परिवहन मंत्रालय द्वारा नियम बनाना ही पर्याप्त नहीं है; उन नियमों का कड़ाई से पालन जब तक नहीं किया जाएगा, तब तक सड़क हादसों को रोकना मुश्किल होगा।