29 अप्रैल।
सड़क पर निकलते ही नागरिक मानो किसी अदृश्य जाल में फंस जाता है। हर मोड़ पर नियम, हर चूक पर जुर्माना—बिना हेलमेट 1000 रुपये, नो-पार्किंग 3000, बीमा नहीं तो 1000, शराब पीकर गाड़ी चलाने पर 10000, मोबाइल पर बात करते पकड़े गए तो 2000। कागजों में यह सब “सुरक्षा” के नाम पर है, लेकिन जमीनी हकीकत इसे एकतरफा ‘जुर्माना राज’ में बदल देती है। सवाल सीधा है—क्या कानून सिर्फ जनता को डराने के लिए हैं, या सिस्टम पर भी लागू होते हैं?
सच्चाई यह है कि नियमों की तलवार केवल आम नागरिक के सिर पर लटकती है, जबकि प्रशासनिक तंत्र जवाबदेही से लगभग मुक्त नजर आता है। जिस व्यवस्था को सड़क सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए, वही व्यवस्था खुद अव्यवस्था का सबसे बड़ा कारण बन चुकी है। शहरों में खराब पड़े ट्रैफिक सिग्नल महीनों तक यूं ही झिलमिलाते रहते हैं या पूरी तरह बंद रहते हैं, लेकिन इनके लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कभी कोई कार्रवाई होती नहीं दिखती। जब सिग्नल ही काम नहीं कर रहे, तो नियमों का पालन कैसे होगा? और जब पालन संभव ही नहीं, तो दंड किस बात का?
पार्किंग की समस्या इस पाखंड को और उजागर करती है। शहरों में योजनाबद्ध पार्किंग का अभाव है, लेकिन ‘नो-पार्किंग’ के नाम पर चालान काटने की मशीन पूरी रफ्तार से चलती रहती है। यह ऐसा खेल है, जहां नागरिक को पहले मजबूरी में गलती करने पर धकेला जाता है और फिर उसी गलती के लिए सजा दी जाती है। क्या यह कानून का पालन है या खुलेआम राजस्व वसूली?
सड़कों की हालत पर नजर डालें तो तस्वीर और भी भयावह हो जाती है। गड्ढों से भरी सड़कें हर साल न जाने कितनी जानें लेती हैं, लेकिन इन मौतों का कोई हिसाब नहीं रखा जाता। बरसात में ये गड्ढे मौत के कुएं बन जाते हैं। सवाल उठता है—अगर एक व्यक्ति ट्रैफिक नियम तोड़ने पर दोषी है, तो क्या घटिया निर्माण और लापरवाही के लिए जिम्मेदार ठेकेदार और अधिकारी निर्दोष हैं? आखिर उनकी जवाबदेही कब तय होगी?
फुटपाथ, जो पैदल चलने वालों के लिए बनाए गए थे, अब अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुके हैं। दुकानों, ठेलों और अवैध कब्जों ने उन्हें निगल लिया है। नतीजा यह है कि पैदल यात्री सड़क पर चलने को मजबूर हैं और दुर्घटनाओं का शिकार होते हैं। सड़क किनारे लाइटें या तो खराब हैं या मौजूद ही नहीं हैं, जिससे रात में खतरा और बढ़ जाता है। खुले मेनहोल, अधूरी खुदाई और बेतरतीब निर्माण कार्य इस बात के प्रमाण हैं कि नागरिकों की सुरक्षा सिस्टम की प्राथमिकता में कहीं नहीं है।
स्थिति और विकराल तब हो जाती है, जब सड़कों पर आवारा पशु और कुत्ते खुलेआम घूमते हैं। इनके कारण होने वाले हादसों में जान गंवाने वालों के लिए कोई जिम्मेदार नहीं ठहराया जाता। क्या यह प्रशासन की नाकामी नहीं है, या फिर यह भी उस ‘सिस्टम’ का हिस्सा है, जो केवल जनता पर सख्ती दिखाना जानता है, खुद पर नहीं?
यह पूरा ढांचा एक खतरनाक असंतुलन की ओर इशारा करता है। एक तरफ नागरिकों से नियमों के अक्षरशः पालन की अपेक्षा की जाती है, दूसरी तरफ प्रशासन अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों से बच निकलता है। यह व्यवस्था न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि लंबे समय में खतरनाक भी है, क्योंकि यह कानून के प्रति सम्मान नहीं, बल्कि आक्रोश और अविश्वास पैदा करती है।
ट्रैफिक नियमों का उद्देश्य डर पैदा करना नहीं, बल्कि सुरक्षा सुनिश्चित करना है। लेकिन जब नियमों का इस्तेमाल केवल जुर्माना वसूली के औजार के रूप में होने लगे, तो उनका नैतिक आधार कमजोर पड़ जाता है। नागरिक तब नियमों को अपनी सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि सजा से बचने के लिए मानते हैं, और यह किसी भी सभ्य समाज के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
जरूरत इस बात की है कि कानूनों को संतुलित बनाया जाए। जिस सख्ती से नागरिकों पर जुर्माना लगाया जाता है, उसी सख्ती से अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। खराब सड़कों, बंद सिग्नलों, अव्यवस्थित पार्किंग और अतिक्रमण के लिए जिम्मेदार लोगों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए। जब तक सिस्टम खुद अनुशासित नहीं होगा, तब तक नागरिकों से अनुशासन की उम्मीद करना बेमानी है।
अब वक्त आ गया है कि यह सवाल जोर-शोर से पूछा जाए—क्या कानून केवल आम आदमी के लिए हैं, या फिर प्रशासन भी इनके दायरे में आएगा? सड़क सुरक्षा का सपना तभी साकार होगा, जब जिम्मेदारी दोनों तरफ बराबर बंटी होगी। वरना यह ‘जुर्माना राज’ यूं ही चलता रहेगा, जहां जनता पिसती रहेगी और सिस्टम बेपरवाह बना रहेगा।