आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सदस्यों के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने से राजनीतिक हलचल तेज हो गई है और पार्टी के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
29 अप्रैल।
आम आदमी पार्टी के सात सांसदों के बीजेपी में विलय को राज्यसभा के चेयरमैन ने मंजूरी दे दी है। इस विलय को विधि-सम्मत माना गया है। केजरीवाल इस पर कानूनी लड़ाई की तैयारी कर रहे हैं। जिस तेजी के साथ यह पार्टी दिल्ली और पंजाब में सत्ता तक पहुंची थी, उसी तेजी से उसने खुद के लिए ढलान भी तैयार कर लिया है। दिल्ली में पराजित हो चुकी है। अब पंजाब के सातों राज्यसभा सांसद बीजेपी में चले गए हैं। अगले साल वहां चुनाव हैं। इन सांसदों के आने से भाजपा राज्य के चुनाव में कुछ खास हासिल नहीं कर पाएगी, लेकिन राज्यसभा में उसकी ताकत बढ़ ही गई है। आम आदमी पार्टी के नेताओं द्वारा सांसदों की बगावत पर जो प्रतिक्रिया आई है, उसमें यही कहा गया है कि इन सांसदों ने पंजाब की जनता का अपमान किया है। राज्यसभा सांसद जनता नहीं चुनती, बल्कि पार्टी और विधायक चुनते हैं। पार्टी मतलब केजरीवाल। जिनको भी राज्यसभा का सदस्य बनाया गया, उनकी काबिलियत से ज्यादा उनसे होने वाली स्वार्थपूर्ति उसका आधार रहा है। राघव चड्ढा और संदीप पाठक जैसे नेता तो पार्टी संगठन में काम कर रहे थे, लेकिन जिन धनपतियों को राज्यसभा भेजा गया, वे भी साथ नहीं रहे। वैसे भी जब कोई राज्यसभा की सदस्यता खरीदता है, तो बाद में पार्टी के साथ रहना उसकी नैतिक बाध्यता नहीं रहती।
केजरीवाल और आम आदमी पार्टी ने राजनीति में ईमानदारी और आंदोलन को अपना एजेंडा बताया, लेकिन उनकी सरकार में आचरण इसके विपरीत रहा। दिल्ली में तो केजरीवाल ने नैतिकता के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। दावा किया गया था कि गाड़ी-बंगला नहीं लेंगे, लेकिन इसके विपरीत मुख्यमंत्री के लिए शीशमहल बनाया गया। करप्शन फ्री गवर्नमेंट का दावा था और केजरीवाल अकेले मुख्यमंत्री थे जिन्हें शराब घोटाले में करप्शन के आरोप में जेल जाना पड़ा। उन्होंने इतनी भी नैतिकता नहीं दिखाई कि जेल जाने के बाद कम से कम मुख्यमंत्री पद छोड़ देते। केजरीवाल ने तो जेल में रहते हुए दिल्ली सरकार चलाने का ऐसा इतिहास बनाया, जो भारतीय संविधान पर एक दाग के रूप में हमेशा कायम रहेगा। केजरीवाल के कारण ही केंद्र सरकार को ऐसा कानून बनाने के लिए लोकसभा में बिल पेश करना पड़ा कि कोई भी मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री 30 दिनों तक जेल में रहेगा तो उसकी सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाएगी। इस बिल का भी विरोध केजरीवाल सहित विपक्षी दल कर रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो भी सांसद बागी हुए हैं, उनमें से कई ऐसे हैं जो आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल हैं। अगर राघव चड्ढा का योगदान देखा जाए तो उन्हें केजरीवाल का सबसे विश्वसनीय माना जाता था। इतनी युवावस्था में ही उन्हें विधायक बनाया गया। पंजाब में चुनाव की पूरी जिम्मेदारी सौंपी गई। पंजाब में आप की सरकार के गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती रही है। पार्टी के साथ टकराव की शुरुआत राघव चड्ढा के साथ हुई। यह संयोग है कि उन्होंने अपने साथ सात पंजाब के राज्यसभा सांसदों को जोड़ लिया।
राजनीतिक दल का कोई लीडर तो हो सकता है, लेकिन राजनीतिक प्रक्रिया तानाशाही के साथ कभी नहीं चलती। केजरीवाल के साथ ऐसा होता रहा है, उनके अनेक साथी उन्हें छोड़कर चले जाते हैं। सभी यह कहते हैं कि उनका व्यवहार तानाशाहीपूर्ण होता है। ईमानदारी से सरकार चलाने की छवि उनकी ध्वस्त हो चुकी है। किसी भी नेता का स्टैंड जब पूरी तरह से राजनीतिक साबित हो जाता है, तो उसकी हालत केजरीवाल जैसी ही हो जाती है। ईमानदारी से राजनीति भी उनका पब्लिक स्टैंड था, लेकिन यह गलत साबित हुआ। केजरीवाल से ज्यादा करप्शन के आरोप किसी भी आप नेता पर नहीं लगे।
बीजेपी पंजाब में अपना जनाधार बढ़ाना चाहती है। सांसदों की बगावत के बाद अब ऐसी चर्चाएं चल रही हैं कि शायद पंजाब में विधायकों में भी बगावत हो। राघव चड्ढा ने राज्यसभा के सांसदों को बीजेपी में शामिल करवाकर अपना दमखम साबित कर दिया है। अगर विधायकों के मामले में भी उन्होंने यह साबित कर दिया, तो आम आदमी पार्टी को बड़ा झटका लग सकता है। अभी तक तो बीजेपी को राज्यसभा में अपनी संख्या बढ़ाने में ही फायदा हुआ है। पंजाब अकेला राज्य है, जहां बीजेपी शिरोमणि अकाली दल के सहारे अब तक रही है। अब तक उसने अपने बलबूते पर चुनाव नहीं लड़ा है। इस बार वह अकेले चुनाव में जा सकती है। इसमें इन नेताओं की भूमिका हो सकती है।
बनावटी और दिखावटी राजनीति का हश्र केजरीवाल और आम आदमी पार्टी जैसा ही होता है। केजरीवाल जब जेल में थे, तब उनकी पत्नी पार्टी की कमान संभालते दिखने लगी थीं। यह पार्टी भी पारिवारिक पार्टी जैसा ही व्यवहार करती दिख रही है। इस पार्टी का बहुत लंबा भविष्य दिखाई नहीं पड़ता है। आप का जनाधार वही माना जाता है जो कांग्रेस का रहा है। बीजेपी का समर्थक समूह इससे बिल्कुल अलग है।
उसी राजनीतिक पार्टी में विद्रोह होता है, जहां एकाधिकार की प्रवृत्ति होती है, जहां सत्ता में हिस्सेदारी में संतुलन नहीं रखा जाता, जहां राजनीतिक लूट होती है लेकिन बंटवारा नहीं होता। कुछ खास लोगों तक ही सब कुछ सिमटा रहता है। राज्यसभा सांसदों की टूट में ईडी की भी भूमिका देखी जा रही है। जिन सांसदों में बगावत हुई है, उनमें दो पर ईडी के छापे पड़े थे। दोनों प्रक्रियाओं को जोड़कर देखना राजनीतिक नजरिया है। जिन पर छापे नहीं पड़े, उनकी बगावत का कारण क्या हो सकता है। जो कारण उनका है, वही सबका है।
केजरीवाल जिन राज्यों में राजनीति कर रहे हैं, वहां उनका मुकाबला कांग्रेस और बीजेपी से है। दोनों से उनके राजनीतिक रिश्ते दुश्मनी जैसे ही लगते हैं। जब उनके अपने ही साथ छोड़ रहे हैं, तो माना यही जाएगा कि जहां लूट है, वहां हिस्सेदारी के लिए ही टूट है। उनका भविष्य वैसा ही है जैसा राजनीति में ईमानदारी का है।