काठमांडू, 29 अप्रैल
नेपाल में सरकार द्वारा दो अध्यादेश जारी किए जाने के निर्णय को लेकर सत्तारूढ़ दल के भीतर ही मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं, जहां राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के सांसदों ने इस कदम पर अलग-अलग राय व्यक्त की है और राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
सरकार ने संसद सत्र को स्थगित कर संवैधानिक परिषद और सहकारी क्षेत्र से जुड़े दो अध्यादेश राष्ट्रपति के समक्ष भेजने की सिफारिश की है, जिसके बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों में तीखी चर्चा शुरू हो गई है। इसी बीच सत्तारूढ़ दल के भीतर भी विरोध और समर्थन की स्थिति स्पष्ट रूप से विभाजित दिखाई दी।
सांसदों के एक वर्ग ने इस निर्णय पर असहमति जताते हुए कहा कि बहुमत के बावजूद संसद को दरकिनार कर अध्यादेश लाना उचित प्रक्रिया नहीं है। उनका कहना है कि इस प्रकार का कदम संसदीय परंपरा और उसकी भावना के अनुरूप नहीं है, भले ही यह संवैधानिक अधिकार के दायरे में आता हो।
एक सांसद ने स्पष्ट रूप से कहा कि संविधान केवल शब्दों का दस्तावेज नहीं है, बल्कि उसकी मूल भावना का पालन करना आवश्यक है, और इस बार उस भावना को नजरअंदाज किया गया है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पहले भी विपक्ष द्वारा ऐसे कदमों पर सवाल उठाए जाते रहे हैं, जो अब सत्ता पक्ष की स्थिति में भी सामने आ रहे हैं।
दूसरी ओर, पार्टी के एक अन्य सांसद ने अध्यादेश का समर्थन करते हुए इसके विरोध को गलत बताया है। उन्होंने कहा कि कानून निर्माण की प्रक्रिया समय लेने वाली होती है और इसमें विभिन्न चरणों से गुजरना पड़ता है, जिसके कारण सामान्य परिस्थितियों में भी लंबा समय लगता है।
उन्होंने यह भी कहा कि असली प्रश्न यह नहीं है कि अध्यादेश क्यों लाया गया, बल्कि यह है कि उसका उद्देश्य और विषय क्या है। उनके अनुसार इस प्रक्रिया को लेकर उठाए जा रहे सवालों में तर्कसंगतता की कमी है।
पार्टी के भीतर बढ़ते मतभेदों के चलते संगठनात्मक स्तर पर भी हलचल बढ़ गई है और पार्टी प्रमुख ने सभी सांसदों की बैठक बुलाने का निर्णय लिया है। बैठक के लिए सभी सांसदों को संसदीय दल कार्यालय में उपस्थित होने के निर्देश दिए गए हैं।






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