जल जीवन मिशन के तहत स्कूलों में पेयजल आपूर्ति के दावों और वास्तविक स्थिति के बीच बड़े अंतर ने प्रदेश के हजारों विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं की कमी को उजागर कर दिया है।
29 अप्रैल।
भीषण गर्मी के बीच जब नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत हुई, तो लाखों बच्चे उम्मीद के साथ स्कूल लौटे। लेकिन मध्यप्रदेश के हजारों सरकारी स्कूलों में आज भी सबसे बुनियादी जरूरत, पेयजल की व्यवस्था अधूरी है। सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘जल जीवन मिशन’ का लक्ष्य था कि प्रदेश के हर स्कूल में नल के माध्यम से शुद्ध पानी उपलब्ध कराया जाए, लेकिन जमीनी सच्चाई इन दावों से काफी दूर नजर आती है। प्रदेश के 93,419 सरकारी स्कूलों में नल से जल पहुंचाने का लक्ष्य तय किया गया था। प्रशासनिक रिपोर्टों में यह दिखाया जा रहा है कि बड़ी संख्या में स्कूलों तक पाइपलाइन पहुंच चुकी है, लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि लगभग 17,000 से अधिक स्कूल आज भी पानी से वंचित हैं। कई जगह पाइपलाइन तो बिछी है, लेकिन पानी की आपूर्ति शुरू नहीं हुई। कहीं नल लगे हैं, तो टोटियां गायब हैं और कहीं पूरे ढांचे ही जर्जर हो चुके हैं।
93,419 स्कूलों में पेयजल पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया, लेकिन लगभग 70,000 स्कूलों तक ही पाइपलाइन पहुंच पाई। 17,000 से अधिक स्कूल अब भी पानी से वंचित हैं और हजारों स्कूलों में अधूरे या निष्क्रिय ढांचे पड़े हैं। कई जिलों में 30% से 50% तक काम अधूरा है। ये आंकड़े बताते हैं कि योजना की रफ्तार और निगरानी दोनों में गंभीर खामियां हैं। जिलावार स्थिति भी इसी सच्चाई को उजागर करती है। राजगढ़ जिला इस योजना की सबसे कमजोर कड़ी बनकर सामने आया है। यहां लगभग 19,076 स्कूलों के लक्ष्य के मुकाबले केवल 1,079 स्कूलों में ही काम पूरा हो पाया है। भिंड में 1,888 स्कूलों के लक्ष्य के मुकाबले 831 स्कूल अधूरे हैं। छतरपुर में 2,118 स्कूलों में से 882 में काम शुरू ही नहीं हुआ। मुरैना में 1,272 स्कूलों में पानी नहीं पहुंचा, जबकि बड़वानी में 3,042 में से 1,133 स्कूलों में योजना की शुरुआत तक नहीं हुई। इन पांच जिलों के आंकड़े मिलाकर देखें तो करीब 4,500 से अधिक स्कूलों में यह मिशन केवल कागज़ों तक सीमित है।
भोपाल संभाग में भी स्थिति विरोधाभासी है। सीहोर, रायसेन और विदिशा जैसे जिलों में प्रशासन दावा कर रहा है कि लगभग सभी स्कूलों में काम पूरा हो चुका है, लेकिन जमीनी रिपोर्ट्स इससे अलग तस्वीर पेश करती हैं। विदिशा में 1,998 स्कूलों का लक्ष्य था, लेकिन 748 में काम शुरू ही नहीं हुआ। रायसेन में 1,940 स्कूलों में से केवल 494 में ही पाइपलाइन या नल की व्यवस्था दिखाई देती है। यह अंतर दर्शाता है कि आंकड़ों को सजाकर सफलता दिखाने की कोशिश की जा रही है, जबकि वास्तविकता में समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। ग्वालियर संभाग की स्थिति भी चिंताजनक है। अशोकनगर में 1,209 स्कूलों में से 262 में काम शुरू नहीं हुआ, जबकि गुना में 1,769 के लक्ष्य में 176 स्कूल अब भी योजना से बाहर हैं। यह स्थिति बताती है कि योजना का क्रियान्वयन पूरे प्रदेश में असमान और धीमा है।
जमीनी हकीकत यह है कि कई जगह ढांचे तो बने हैं, लेकिन पानी नहीं है। रायसेन जिले के सांची ब्लॉक के बसई गांव में स्कूल परिसर में जल जीवन मिशन के तहत बनाए गए ढांचे मौजूद हैं, लेकिन उनमें पानी नहीं है। नलों में टोटियां तक गायब हैं। गुना जिले के मातापुरा स्कूल में भी यही हाल है—सिर्फ निर्माण कार्य दिखता है, लेकिन बच्चों के लिए पानी उपलब्ध नहीं। यह स्थिति केवल एक-दो स्कूलों की नहीं, बल्कि हजारों स्कूलों की सच्चाई है।
पानी की कमी का सबसे बड़ा असर बच्चों पर पड़ता है। तेज गर्मी में जब तापमान 40 डिग्री से ऊपर पहुंचता है, तब स्कूलों में पानी न होना गंभीर समस्या बन जाता है। बच्चों को या तो घर से पानी लाना पड़ता है या फिर पढ़ाई छोड़कर पानी की व्यवस्था करनी पड़ती है। इससे उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है और स्वास्थ्य पर भी खतरा बढ़ता है। डिहाइड्रेशन, थकान और जलजनित बीमारियों का खतरा ऐसे हालात में और अधिक बढ़ जाता है।
योजना की धीमी रफ्तार के पीछे कई कारण सामने आते हैं—प्रशासनिक लापरवाही, कमजोर निगरानी, ठेकेदारों द्वारा अधूरा काम छोड़ना, तकनीकी समस्याएं, रखरखाव की कमी, फंड का समय पर उपयोग न होना और स्थानीय स्तर पर जवाबदेही का अभाव। इन कारणों ने मिलकर इस योजना की गति को धीमा कर दिया है। स्थिति को सुधारने के लिए सख्त निगरानी और जवाबदेही तय करना जरूरी है। हर जिले में नियमित निरीक्षण होना चाहिए और अधूरे कार्यों को तय समय सीमा में पूरा किया जाना चाहिए। साथ ही, स्कूल प्रबंधन समितियों और स्थानीय समुदाय को भी इस योजना में सक्रिय रूप से शामिल किया जाना चाहिए, ताकि पारदर्शिता बढ़े और समस्याओं का समाधान जल्दी हो सके। ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम के जरिए वास्तविक समय की जानकारी सार्वजनिक करना भी एक प्रभावी कदम हो सकता है।
जल जीवन मिशन एक बेहद महत्वपूर्ण योजना है, जिसका सीधा संबंध बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा से है। लेकिन जब तक यह योजना पूरी तरह जमीन पर लागू नहीं होती, तब तक इसके दावे अधूरे ही रहेंगे। मध्यप्रदेश के हजारों स्कूल आज भी पानी की बुनियादी सुविधा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में जरूरी है कि सरकार और प्रशासन कागज़ी सफलता से आगे बढ़कर वास्तविक सुधार पर ध्यान दें। जब हर स्कूल में नल से साफ पानी बहेगा, तभी यह मिशन अपने असली उद्देश्य को हासिल कर पाएगा।