नई दिल्ली, 29 अप्रैल।
उच्चतम न्यायालय ने शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत बच्चों के अनिवार्य प्रवेश को पूरी तरह बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया है कि यह केवल एक कानूनी व्यवस्था नहीं बल्कि देश का राष्ट्रीय मिशन है। न्यायालय ने कहा कि सरकार द्वारा तय किए गए 25 प्रतिशत आरक्षण के तहत चयनित बच्चों को निजी और बिना सहायता प्राप्त विद्यालयों में प्रवेश देना अनिवार्य है और इसमें किसी प्रकार की देरी या आपत्ति स्वीकार नहीं की जा सकती।
न्यायालय ने अपने आदेश में साफ किया कि पड़ोस के सभी स्कूल, चाहे वे निजी ही क्यों न हों, राज्य सरकार द्वारा भेजी गई चयनित सूची के आधार पर विद्यार्थियों को प्रवेश देने के लिए बाध्य हैं। पीठ ने यह भी कहा कि कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को प्रवेश से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 21ए के तहत उनके शिक्षा के मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि सरकार द्वारा लागू 25 प्रतिशत आरक्षण व्यवस्था समाज की संरचना में बड़े बदलाव की क्षमता रखती है और यह समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। साथ ही अदालत ने कहा कि इस कानून का प्रभावी क्रियान्वयन ही निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा के उद्देश्य को वास्तविक रूप से पूरा कर सकता है।
इस मामले में न्यायालय ने लखनऊ के एक निजी विद्यालय की अपील को खारिज कर दिया, जिसने आरटीई के तहत चयनित छात्रा को प्रवेश देने से इनकार कर दिया था। उच्च न्यायालय के निर्णय को सही ठहराते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि स्कूल राज्य सरकार के पात्रता निर्णयों को न तो चुनौती दे सकते हैं और न ही उन्हें बदल सकते हैं।
अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि एक बार जब सरकार चयनित विद्यार्थियों की सूची विद्यालयों को भेज देती है, तो उन्हें बिना किसी शर्त के प्रवेश देना अनिवार्य होता है, अन्यथा शिक्षा का अधिकार केवल एक औपचारिक वादा बनकर रह जाएगा।








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