न्यायपालिका
29 Apr, 2026

मानवाधिकार आयोग की भूमिका पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, मदरसा जांच मामले में उठे सवाल

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मदरसों की जांच से जुड़े मामले में मानवाधिकार आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए उनके अधिकार क्षेत्र और निष्क्रियता पर कड़ी टिप्पणी की है।

प्रयागराज, 29 अप्रैल।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की कार्यशैली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह हैरानी की बात है कि आयोग उत्तर प्रदेश के मदरसों की जांच जैसे मामलों में सक्रियता दिखा रहा है, जबकि मॉब लिंचिंग, भीड़ हिंसा और सतर्कतावादी हमलों जैसे गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में स्वतः संज्ञान लेने के उदाहरण सामने नहीं आते।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें शिक्षक संघ मदरिस अरबिया ने वर्ष 2025 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा प्रदेश के 558 सहायता प्राप्त मदरसों के खिलाफ आर्थिक अपराध शाखा से जांच कराने के आदेश को चुनौती दी है।

आयोग के समक्ष प्रस्तुत शिकायत में आरोप लगाया गया था कि संबंधित मदरसे अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से मानकों का पालन किए बिना सरकारी अनुदान प्राप्त कर रहे हैं तथा रिश्वत और कमीशन के आधार पर अयोग्य शिक्षकों की नियुक्ति की जा रही है। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में यह तर्क दिया गया कि कथित घटनाओं के एक वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद आयोग को जांच का आदेश देने का अधिकार नहीं रह जाता, जिस पर पहले ही अंतरिम रोक लगाई जा चुकी है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि मानवाधिकार आयोग उन मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है, जो उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि यह देखा नहीं गया कि आयोग ने उन मामलों में स्वतः संज्ञान लिया हो, जहां सतर्कतावादी समूह कानून अपने हाथ में लेकर नागरिकों पर अत्याचार करते हैं या विभिन्न समुदायों के बीच तनाव से जुड़ी घटनाएं सामने आती हैं।

उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि जब मॉब लिंचिंग, अल्पसंख्यकों पर हमले और जांच में लापरवाही जैसी घटनाएं सामने आती हैं, तब आयोगों की निष्क्रियता चिंता का विषय बन जाती है। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि मानवाधिकार आयोग कोई न्यायिक निकाय नहीं है जो मुकदमों का परीक्षण करे, बल्कि आवश्यकता होने पर वह सक्षम अदालत या पुलिस को कार्रवाई के लिए कह सकता है, लेकिन सीधे कार्यपालिका को जांच आदेश देने की उसकी शक्ति संदेह के घेरे में आती है, विशेषकर तब जब मामला मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़ा न हो।

प्रथम दृष्टया यह मानते हुए कि आयोग ने ऐसे मामले में हस्तक्षेप किया है, जिसमें मानवाधिकार उल्लंघन का स्पष्ट प्रश्न नहीं है, अदालत ने आयोग को नोटिस जारी करते हुए पूर्व अंतरिम आदेश को जारी रखा है। मामले की अगली सुनवाई अब ग्यारह मई 2026 को निर्धारित की गई है।V

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