कोच्चि, 29 अप्रैल।
औद्योगिक संबंध संहिता संशोधन कानून 2026 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका को केरल उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं के किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं हुआ है, इसलिए इस मामले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। यह याचिका एम.के. सुरेश कुमार द्वारा दायर की गई थी, जिसमें संशोधन को असंवैधानिक, मनमाना और मूल कानून की सीमाओं से बाहर बताया गया था।
विवादित संशोधन के तहत औद्योगिक संबंध संहिता 2020 की धारा 104 में उपधारा 1ए जोड़ी गई है। इसके अनुसार ट्रेड यूनियन अधिनियम 1926, औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम 1946 और औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 को समाप्त कर दिया गया है, लेकिन यह भी प्रावधान किया गया है कि पुराने कानूनों के तहत कार्यरत न्यायाधिकरण और प्राधिकरण तब तक काम करते रहेंगे, जब तक नई व्यवस्था पूरी तरह लागू नहीं हो जाती।
इसी तरह एक पूर्व अधिसूचना को भी चुनौती दी गई थी, जिसमें कहा गया था कि पुराने श्रम न्यायालय और ट्रिब्यूनल नए ढांचे के बनने तक पुराने और नए मामलों की सुनवाई जारी रखेंगे। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करती है और इसे मनमाना बताया गया।
न्यायालय ने अपने विश्लेषण में कहा कि याचिकाकर्ताओं को यह कहने का अधिकार नहीं है कि औद्योगिक विवादों का निपटारा केवल नए गठित निकायों द्वारा ही होना चाहिए। अदालत ने यह भी माना कि उपधारा 1ए एक गैर-अवरोधक प्रावधान है, इसलिए यह अन्य प्रावधानों के बावजूद लागू रहेगा।
सुनवाई के दौरान यह भी उल्लेख किया गया कि याचिकाकर्ताओं ने यह तर्क नहीं दिया कि संसद के पास ऐसा कानून बनाने की क्षमता नहीं है या यह संविधान की मूल संरचना के विरुद्ध है। अदालत ने यह भी कहा कि इसे मनमाना ठहराने का कोई आधार नहीं पाया गया।
फैसले में यह स्पष्ट किया गया कि नई व्यवस्था लागू होने तक पुराने न्यायाधिकरणों का काम जारी रहना आवश्यक है, ताकि औद्योगिक विवादों के निपटारे में कोई शून्यता न उत्पन्न हो। अदालत ने यह भी कहा कि केवल प्रक्रियात्मक परिवर्तन से मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता, जब तक कि कानून बनाने की शक्ति संविधान के दायरे में हो।
अंत में अदालत ने याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया और यह भी कहा कि संबंधित अन्य याचिका के साथ इसे जोड़ने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि दोनों मामलों के मुद्दे अलग-अलग हैं।








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