इंदौर, 28 अप्रैल
धार जिले स्थित ऐतिहासिक भोजशाला विवाद को लेकर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में सोमवार को नियमित सुनवाई जारी रही। सुनवाई के दौरान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए। वर्ष 1998 में दिए गए अपने जवाब में एएसआई ने कहा था कि भोजशाला मंदिर है या मस्जिद, इस पर कोई स्पष्ट निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, लेकिन अब वही संस्था इसे मंदिर बता रही है।
न्यायालय की युगलपीठ के समक्ष हस्तक्षेपकर्ता काजी जकुल्ला की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा मेनन ने अपने तर्क प्रस्तुत किए। करीब दो घंटे चली सुनवाई के दौरान उन्होंने सरकार और एएसआई द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाते हुए इसे संदेह के घेरे में बताया।
मेनन ने याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर दोनों जनहित याचिकाओं पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस नामक ट्रस्ट का गठन वर्ष 2021 में हुआ और अगले ही वर्ष इसने इस मामले को लेकर याचिका दायर कर दी। साथ ही याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी ने स्वयं को सामाजिक कार्यकर्ता बताया है, लेकिन उनकी सामाजिक गतिविधियों का कोई स्पष्ट विवरण न्यायालय में प्रस्तुत नहीं किया गया।
उन्होंने अदालत के समक्ष यह भी कहा कि यह मामला जनहित याचिका का नहीं, बल्कि स्वामित्व विवाद का है, जिसकी सुनवाई सिविल न्यायालय में होना उचित है। उनके अनुसार, आर्टिकल 226 के तहत याचिका दाखिल करना उचित नहीं है, इसलिए इस पर उच्च न्यायालय को भारी लागत लगानी चाहिए।
मेनन ने यह भी आरोप लगाया कि याचिकाकर्ताओं ने अपने वास्तविक पेशे की जानकारी छिपाकर खुद को समाजसेवी के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 1997 में इसी प्रकार की याचिका सिविल सूट दायर करने की स्वतंत्रता के साथ वापस ली गई थी, लेकिन अब तक सिविल न्यायालय में कोई वाद दायर नहीं किया गया। वर्तमान याचिका को उन्होंने विलंबित और नियमों के विपरीत बताते हुए निरस्त करने की मांग की।
सुनवाई के दौरान सरकार और एएसआई के रुख में विरोधाभास का मुद्दा भी उठाया गया। मेनन ने कहा कि पहले इस स्थल को न मंदिर बताया गया था और न मस्जिद, लेकिन अब इसे केवल मंदिर बताया जा रहा है, जिससे सरकार की भूमिका पर संदेह उत्पन्न होता है और याचिकाकर्ताओं को समर्थन मिलने का संकेत मिलता है।
एएसआई की ओर से अधिवक्ता सुनील जैन ने न्यायालय को बताया कि भोजशाला सर्वेक्षण से जुड़ी वीडियो रिकॉर्डिंग सीलबंद हार्ड ड्राइव के रूप में प्रस्तुत की जा चुकी है। इसके अलावा यह भी जानकारी दी गई कि सर्वे की वीडियो को ईआरपी प्रणाली पर अपलोड किया गया है, ताकि संबंधित पक्ष उसे देख सके।
मामले में हस्तक्षेपकर्ता पक्ष की ओर से तर्क आगे भी जारी रहेंगे और अगली सुनवाई 28 अप्रैल को निर्धारित की गई है। इस प्रकरण में चार जनहित याचिकाएं और एक अपील पर उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बाद सुनवाई चल रही है। धार निवासी काजी जकुल्ला ने दो याचिकाओं में हस्तक्षेप करते हुए आवेदन दिया है और वर्ष 2003 के फैसले को चुनौती देते हुए अपील भी दायर की है।











