02 अप्रैल।
हनुमान जयंती भारत का एक अत्यंत पवित्र और भावनात्मक पर्व है, जो भगवान हनुमान के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि उस दिव्य शक्ति के पृथ्वी पर आगमन की कहानी है, जिसका उद्देश्य धर्म की रक्षा करना और भगवान राम की सेवा करना था। कहा जाता है कि जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ गया और राक्षसों का अत्याचार अपने चरम पर पहुँच गया, तब देवताओं ने मिलकर एक ऐसे शक्तिशाली सहयोगी को जन्म देने का संकल्प लिया, जो भगवान राम के कार्यों में उनकी सहायता कर सके। इसी दिव्य योजना के तहत हनुमान जी का जन्म चैत्र मास की पूर्णिमा को हुआ।
उनकी माता अंजनी थीं, जो एक अप्सरा से मानव रूप में आई थीं, और उनके पिता केसरी वानरराज थे। पवन देव के आशीर्वाद से उन्हें असाधारण बल और गति प्राप्त हुई, इसी कारण वे पवनपुत्र कहलाए। बचपन में हनुमान जी बेहद नटखट, जिज्ञासु और निडर थे। एक दिन उन्होंने उगते हुए सूर्य को एक चमकता हुआ फल समझ लिया और उसे खाने के लिए आकाश में उड़ पड़े। यह घटना केवल उनकी शरारत नहीं, बल्कि उनकी असीम शक्ति का संकेत थी।
लेकिन उनकी इसी चंचलता से परेशान होकर ऋषियों ने उन्हें श्राप दिया कि वे अपनी शक्तियों को तब तक भूल जाएंगे, जब तक कोई उन्हें याद न दिलाए। यही वजह रही कि आगे चलकर जब वे भगवान राम से मिले, तब तक वे अपनी वास्तविक क्षमता से अनजान थे। पर जैसे ही उन्होंने राम का नाम सुना और उनके कार्यों को समझा, उनके भीतर छिपी सारी शक्तियाँ जाग उठीं और उनका जीवन पूरी तरह बदल गया।
रामायण में वर्णित है कि हनुमान जी ने किस प्रकार समुद्र लांघकर लंका पहुँचकर माता सीता का पता लगाया, अशोक वाटिका में उन्हें राम का संदेश दिया, और फिर अपनी वीरता का परिचय देते हुए लंका को जला डाला। यह केवल शक्ति का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि अपने प्रभु के प्रति उनकी अटूट निष्ठा का प्रमाण था। आगे चलकर जब लक्ष्मण युद्ध में घायल हो गए, तब हनुमान जी ने संजीवनी बूटी लाने के लिए पूरा पर्वत ही उठा लिया। यह प्रसंग उनकी बुद्धिमत्ता, समर्पण और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता को दर्शाता है।
हनुमान जी ने भगवान राम को इसलिए चुना, क्योंकि वे धर्म, सत्य और मर्यादा के प्रतीक थे। हनुमान जी का स्वभाव ही ऐसा था कि वे स्वयं को किसी महान उद्देश्य के लिए समर्पित करना चाहते थे। उनकी भक्ति में न कोई अहंकार था, न कोई स्वार्थ—केवल सेवा और समर्पण था।
हनुमान जयंती के दिन भक्त व्रत रखते हैं, मंदिरों में जाकर पूजा करते हैं, हनुमान चालीसा और सुंदरकांड का पाठ करते हैं। जगह-जगह भंडारे और शोभायात्राएँ निकाली जाती हैं और पूरा वातावरण भक्ति और ऊर्जा से भर जाता है।

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लेकिन इस पर्व का असली अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं है, बल्कि यह हमें यह सिखाता है कि सच्ची शक्ति हमारे अंदर ही होती है, बस उसे पहचानने की जरूरत होती है। जब हम अपने अहंकार को त्यागकर किसी सच्चे उद्देश्य के लिए काम करते हैं, तो हम भी अपने जीवन में असंभव को संभव बना सकते हैं।
आज के वर्तमान समय में, जब जीवन में चुनौतियाँ और प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही हैं, हनुमान जी का चरित्र साहस, धैर्य और समर्पण का एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। उनकी कथा यह दर्शाती है कि आत्मविश्वास, निष्ठा और कर्तव्य के प्रति समर्पण के साथ कठिन परिस्थितियों का सामना किया जा सकता है। इसी कारण हनुमान जयंती का महत्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और नैतिक मूल्यों को भी सुदृढ़ करने का संदेश देती है।


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