हैदराबाद, 04 नवंबर।
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि बैंक अधिकारियों के खिलाफ केवल कर्ज वसूली या पुनर्वास पैकेज से जुड़े विवाद के आधार पर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने चवन धर्मेंद्र एवं अन्य बनाम तेलंगाना राज्य मामले में यह फैसला सुनाते हुए प्राथमिकी रद्द कर दी। मामले में भारतीय स्टेट बैंक ने हैदराबाद की ऋताशा इंफ्रा प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड को कर्ज दिया था, जिसका खाता 2016 में एनपीए हो गया। कंपनी ने भारतीय रिजर्व बैंक की एमएसएमई पुनर्वास योजना के तहत राहत पैकेज मांगा था। कंपनी के निदेशक वाई. राजशेखर ने आरोप लगाया कि बैंक ने उनके एससी/एसटी समुदाय से होने के कारण जानबूझकर पैकेज नहीं दिया और दस्तावेजों में हेरफेर की। इसके बाद 2019 में हैदराबाद के सीआईडी थाने में अधिनियम की धारा 3(1)(क्यू) के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई गई।
तेलंगाना उच्च न्यायालय ने बैंक अधिकारियों को मुकदमे का सामना करने का निर्देश दिया था, जिसके बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस अधिनियम के तहत मामला बनाने के लिए जाति के आधार पर अपमान, गाली या बेइज्जती का ठोस आरोप होना जरूरी है, जबकि इस प्रकरण में ऐसा कोई आरोप नहीं था। केवल यह दावा कि जाति के कारण कर्ज या राहत पैकेज नहीं मिला, आपराधिक कार्रवाई के लिए पर्याप्त नहीं है। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि आरबीआई के दिशानिर्देशों का पालन न करना या पुनर्वास पैकेज नहीं देना अपने आप में एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं बनता। अदालत के अनुसार, यह मूलतः बैंकिंग और कर्ज से जुड़ा व्यावसायिक विवाद है, जिसे आपराधिक रंग देना कानून का दुरुपयोग है। बैंक के खिलाफ शिकायत होने पर उचित मंच कर्ज वसूली न्यायाधिकरण है, न कि पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराना।














