सरकार व नीतियाँ
05 May, 2026

दुर्लभ रोगों पर राष्ट्रीय मंथन शुरू, उपचार और नवाचार पर जोर

नई दिल्ली में दुर्लभ रोगों पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में नवाचार, शीघ्र निदान, स्वदेशी मॉडल और बेहतर उपचार व्यवस्था को मजबूत करने पर विस्तृत चर्चा की गई।

नई दिल्ली, 05 मई।

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने नई दिल्ली में दुर्लभ रोगों पर आधारित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ किया, जो 05 से 06 मई तक आयोजित किया जा रहा है। यह आयोजन दुर्लभ बीमारियों से जुड़ी चुनौतियों के समाधान और स्वास्थ्य प्रणाली को अधिक सुदृढ़ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

कार्यक्रम में केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव श्रीमती पुण्य सलीला श्रीवास्तव ने कहा कि इस सम्मेलन का उद्देश्य हितधारकों के समक्ष आने वाली समस्याओं को समझना, नवाचार को बढ़ावा देना तथा देश में दुर्लभ रोगों के उपचार और प्रबंधन के लिए नए विचार विकसित करना है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में इन रोगों को प्राथमिकता दी गई थी और वर्ष 2021 में अलग नीति लागू कर इसे संस्थागत रूप दिया गया, जिससे भारत एक व्यापक राष्ट्रीय ढांचा स्थापित करने वाले देशों में शामिल हुआ।

उन्होंने बताया कि यह नीति देश के प्रमुख तृतीयक अस्पतालों में स्थापित उत्कृष्टता केंद्रों के माध्यम से लागू की जा रही है, जिनकी संख्या कुछ वर्षों में बढ़कर आठ से पंद्रह हो गई है। इनमें पूर्वोत्तर क्षेत्र के दो केंद्र भी शामिल हैं, जिससे निदान और उपचार की राष्ट्रीय क्षमता मजबूत हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि दुर्लभ रोगों के लिए वित्तीय सहायता बढ़ाकर पचास लाख रुपये कर दी गई है, जिससे मरीजों को उपचार में राहत मिली है।

केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव ने यह भी उल्लेख किया कि सरकार जीवन रक्षक दवाओं पर सीमा शुल्क में छूट जैसे कदम उठा रही है और अतिरिक्त दवाओं को इस सूची में शामिल करने के सुझाव आमंत्रित किए जा रहे हैं। उन्होंने राज्यों में जागरूकता और क्षमता विकास कार्यक्रमों के विस्तार पर बल देते हुए कहा कि जिलों की पहचान कर वहां विशेष पहल की आवश्यकता है, जिसमें मंत्रालय पूरा सहयोग देगा।

उन्होंने शीघ्र निदान के लिए आनुवंशिक जांच, प्रारंभिक पहचान और समुचित चिकित्सकीय प्रबंधन की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। साथ ही कहा कि इन रोगों से निपटने के लिए सभी हितधारकों का निरंतर सहयोग आवश्यक है, तभी प्रभावी परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।

स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के सचिव तथा भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल ने कहा कि पिछले तीन दशकों में इस क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। पहले जहां निदान और उपचार लगभग असंभव था, वहीं अब वित्तीय सहायता और उपचार की उपलब्धता से स्थिति में सुधार हुआ है।

उन्होंने भारत के लिए स्वदेशी मॉडल विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया और कहा कि पश्चिमी पद्धतियों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय देश को अपनी जनसंख्या आधारित रणनीति, रोकथाम उपायों और डिजिटल तकनीकों का अधिकतम उपयोग करना चाहिए। उन्होंने परिवार आधारित आनुवंशिक जांच और प्रसवपूर्व निदान को भी प्रभावी उपाय बताया।

डॉ. बहल ने कहा कि जैव प्रौद्योगिकी विभाग और वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के सहयोग से जीन थेरेपी तथा अन्य उन्नत तकनीकों पर कार्य तेजी से आगे बढ़ रहा है। साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सोशल मीडिया जैसे उपकरणों के माध्यम से शीघ्र पहचान की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं।

स्वास्थ्य सेवाओं की महानिदेशक डॉ. सुनीता शर्मा ने कहा कि दुर्लभ रोगों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को सभी स्तरों पर एकीकृत करना आवश्यक है, ताकि समय पर रेफरल और निरंतर उपचार सुनिश्चित किया जा सके। उन्होंने स्क्रीनिंग कार्यक्रमों के विस्तार और स्वास्थ्यकर्मियों के प्रशिक्षण पर भी जोर दिया।

दो दिवसीय सम्मेलन में जीनोमिक तकनीक, अनुसंधान सहयोग, किफायती उपचार और रोगी केंद्रित देखभाल मॉडल जैसे विषयों पर तकनीकी सत्र आयोजित किए जाएंगे। मंत्रालय ने सभी रोगियों के लिए सुलभ, किफायती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं की प्रतिबद्धता दोहराई है।

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