सरकार व नीतियाँ
27 Apr, 2026

भारत में अंतर्देशीय जलमार्गों का तेज विस्तार, रिकॉर्ड कार्गो वृद्धि

देश में नदियों और जलमार्गों को आधुनिक परिवहन नेटवर्क के रूप में विकसित करने के साथ रिकॉर्ड कार्गो वृद्धि, बढ़ती यात्री आवाजाही और विस्तृत विस्तार योजनाओं ने इस क्षेत्र को आर्थिक रणनीति का प्रमुख आधार बना दिया है।

नई दिल्ली, 27 अप्रैल।

भारत अपने विशाल नदी तंत्र, नहरों और बैकवॉटर को एक आधुनिक, कुशल और टिकाऊ परिवहन ढांचे में बदलने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, जहां अंतर्देशीय जलमार्ग देश की लॉजिस्टिक्स और आर्थिक रणनीति का अहम स्तंभ बनते जा रहे हैं। मजबूत नीतिगत समर्थन और बढ़ते निवेश के साथ इस क्षेत्र में कार्गो आवाजाही, आधारभूत संरचना और पर्यटन की संभावनाओं में तेज वृद्धि देखी जा रही है।

देश में 23 राज्यों और चार केंद्र शासित प्रदेशों में फैले 20,187 किलोमीटर लंबे 111 राष्ट्रीय जलमार्ग मौजूद हैं, जो दुनिया के सबसे बड़े जल परिवहन नेटवर्क में से एक माने जाते हैं। मार्च 2026 तक इनमें से 32 जलमार्ग सक्रिय हो चुके हैं, जिनकी लंबाई 5,100 किलोमीटर से अधिक है, और अगले पांच वर्षों में इसे 52 जलमार्गों तक बढ़ाने की योजना है। वर्ष 2026-27 के बजट में 20 अतिरिक्त जलमार्गों को सक्रिय करने की घोषणा भी की गई है।

इस विस्तार का आधार यह समझ है कि जलमार्ग सड़क और रेल परिवहन की तुलना में अधिक किफायती और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प प्रदान करते हैं। वैश्विक आकलनों के अनुसार जल परिवहन में ऊर्जा खपत सड़क परिवहन की तुलना में कई गुना कम होती है और उत्सर्जन भी न्यूनतम होता है। लगभग 2,000 टन माल ढोने वाला एक जहाज 125 ट्रकों के बराबर काम करता है, जिससे भीड़, ईंधन खर्च और लॉजिस्टिक्स लागत में कमी आती है।

इन प्रयासों का असर पहले से ही दिखाई दे रहा है। राष्ट्रीय जलमार्गों पर कार्गो आवाजाही 2024-25 में 145.84 मिलियन मीट्रिक टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई और फरवरी 2026 तक यह बढ़कर 198 मिलियन मीट्रिक टन हो गई। यात्री परिवहन भी तेजी से बढ़ा है, जो 2023-24 में 1.61 करोड़ से बढ़कर 2024-25 में 7.6 करोड़ हो गया है।

सरकार का लक्ष्य है कि 2030 तक जल परिवहन की हिस्सेदारी 2 प्रतिशत से बढ़ाकर 5 प्रतिशत की जाए और 2047 तक इसे और अधिक बढ़ाया जाए। इसी अवधि में कार्गो मात्रा 200 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक और 2047 तक 500 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही जलमार्ग और तटीय शिपिंग की संयुक्त हिस्सेदारी को 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 12 प्रतिशत करने की योजना है।

इस बदलाव का प्रमुख आधार मजबूत ढांचा विकास है, जिसमें पर्याप्त गहराई और चौड़ाई वाले जलमार्ग, कार्गो लोडिंग-अनलोडिंग टर्मिनल और सुरक्षित नेविगेशन व्यवस्था शामिल है। राष्ट्रीय जलमार्ग-1 पर गंगा-भागीरथी-हुगली नदी तंत्र में चल रही जल मार्ग विकास परियोजना पर 5,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया गया है, जिसका उद्देश्य वर्षभर बड़े जहाजों की आवाजाही सुनिश्चित करना है।

इस परियोजना से पिछले दशक में NW-1 पर कार्गो परिवहन में 220 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। वाराणसी, साहिबगंज और हल्दिया में मल्टीमॉडल टर्मिनल तथा सड़क-रेल संपर्क से लॉजिस्टिक्स प्रणाली मजबूत हुई है। साथ ही अर्थ गंगा कार्यक्रम के तहत नदी किनारे के छोटे उत्पादकों, किसानों और कारीगरों को जल परिवहन से बाजार से जोड़ा जा रहा है।

नदी मार्ग प्राधिकरण अधिनियम 1985 और राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम 2016 ने इस क्षेत्र को मजबूत कानूनी आधार दिया है। हाल के जलवाहक कार्गो प्रोत्साहन योजना जैसे कदमों से परिचालन लागत में राहत दी जा रही है और निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा मिल रहा है।

हरित नौका दिशा-निर्देशों के तहत स्वच्छ जहाजों की ओर बढ़ने की योजना है, जिसका लक्ष्य 2030 तक कार्बन तीव्रता में 30 प्रतिशत और 2047 तक 70 प्रतिशत की कमी करना है।

डिजिटल तकनीक से संचालन और सुरक्षा को भी मजबूत किया जा रहा है, जिसमें रियल टाइम ट्रैकिंग, मौसम जानकारी और डेटा आधारित निर्णय प्रणाली शामिल है। इससे पारदर्शिता और दक्षता में सुधार हुआ है।

पर्यटन क्षेत्र में भी जलमार्ग नई संभावनाएं खोल रहे हैं, जहां क्रूज यात्राओं की संख्या 2023-24 में 371 से बढ़कर 2024-25 में 443 हो गई है। 2047 तक कई जलमार्गों पर क्रूज पर्यटन विस्तार की योजना है, विशेष रूप से वाराणसी-हल्दिया और ब्रह्मपुत्र क्षेत्र में।

पूर्वोत्तर क्षेत्र में भी जलमार्ग विकास को गति मिल रही है, जहां ब्रह्मपुत्र और बराक नदी प्रणाली में नए टर्मिनल और संपर्क परियोजनाएं क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा दे रही हैं और बांग्लादेश के साथ सीमा पार संपर्क अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बढ़ा रहा है।

आने वाले समय में भारत की रणनीति में आधारभूत ढांचा, तकनीक, नीति और पर्यावरणीय संतुलन को मिलाकर एक आधुनिक जल परिवहन प्रणाली विकसित करने पर जोर है, जिससे लागत घटेगी, रोजगार बढ़ेगा और समावेशी विकास को गति मिलेगी।

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