वाराणसी, 24 मार्च।
उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी में वासंतिक चैत्र नवरात्र का छठवां दिन माता ललिता गौरी को समर्पित है। श्रद्धालुओं ने परम्परानुसार संकठा घाट पर आत्माविश्वेश्वर मंदिर परिसर स्थित मां कात्यायनी देवी और गौरी स्वरूप ललिता गौरी के दरबार में हाजिरी लगाई।
भोर से ही श्रद्धालु दोनों देवी मंदिरों में पहुंचते रहे। मंगला आरती के बाद दर्शन-पूजन का क्रम देर रात तक चलता रहा। मां कात्यायनी के दरबार में महिलाओं की भीड़ अधिक देखी गई। आरती से पहले देवी के विग्रह को पंचामृत और गंगाजल से स्नान कराया गया। विधि-विधान से पूजन के बाद मंदिरों के पट भक्तों के लिए खोल दिए गए।
मां कात्यायनी के बारे में मान्यता है कि देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए वे महर्षि कात्यायन के आश्रम में प्रकट हुईं। महर्षि ने उन्हें कन्या का स्थान दिया, इसलिए देवी कात्यायनी के नाम से विख्यात हुईं। देवी का ध्यान करने से कष्टों से मुक्ति मिलती है और वे भक्त को महाभय से सुरक्षा प्रदान करती हैं। देवी पुराण और स्कंद पुराण में उनके इस स्वरूप की महिमा का विस्तृत विवरण है।
नवगौरी के छठवें स्वरूप ललिता गौरी का अवतार भी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए हुआ। ललिता गौरी तीर्थ क्षेत्र की रक्षा करती हैं और श्रद्धालुओं के विघ्न हरती हैं। उनकी आराधना से ललित कलाओं में विशेष उपलब्धि प्राप्त होती है। माता को अड़हुल का फूल प्रिय है।
मंदिर में दर्शन के लिए आई चौखंभा चौक की पलाश अग्रवाल, सौम्या गुजराती और निरंजना अग्रवाल ने बताया कि हल्दी और कुमकुम चढ़ाने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। खासतौर पर कुवारी कन्याओं को हल्दी-कुमकुम का लेपन करने से मनचाहा वर मिलता है। भक्तों ने घर-परिवार में सुख, शांति और वंश वृद्धि की कामना करते हुए धूप, दीप, नैवैद्य, नारियल और पुष्प अर्पित किए, जिससे शांति और आनंद की अनुभूति हुई।












