संपादकीय
06 Jun, 2026

पर्यावरण बचाना अभियान नहीं, मानव अस्तित्व की निर्णायक लड़ाई

जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जल संकट, वनों की कटाई और बढ़ते तापमान के गंभीर परिणामों को देखते हुए विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि पर्यावरण संरक्षण अब केवल प्रतीकात्मक आयोजनों तक सीमित न रहकर सतत और कठोर नीतिगत एवं व्यक्तिगत बदलावों की अनिवार्यता बन चुका है।

नई दिल्ली, 6 जून।

विश्व पर्यावरण दिवस पर वृक्षारोपण के आयोजन, संगोष्ठियों के मंच और सोशल मीडिया के संकल्प अब केवल रस्म-अदायगी बन चुके हैं। समय आ गया है कि हम स्वीकार करें कि पर्यावरण संरक्षण कोई वार्षिक अभियान नहीं, बल्कि क्षण-प्रतिक्षण लड़ी जाने वाली अस्तित्व की लड़ाई है। संयुक्त राष्ट्र के 'इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज' (आईपीसीसी) की छठी आकलन रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि की लक्ष्मण रेखा हम 2035 तक पार कर जाएंगे। भारत जैसे घनी आबादी वाले देश के लिए यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि आपातकाल की घंटी है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि भारत प्रतिदिन 26,000 टन प्लास्टिक कचरा पैदा करता है। इसमें से 40 प्रतिशत न तो संग्रहित होता है और न ही पुनर्चक्रित। गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना बेसिन विश्व के सबसे प्रदूषित नदी तंत्रों में शामिल है। हम 'नमामि गंगे' का बजट तो बढ़ाते हैं, पर श्रद्धालु स्वयं नदियों में प्लास्टिक और पॉलिथीन प्रवाहित कर देते हैं। यह लड़ाई नदी में नहीं, बल्कि हमारी मानसिकता में लड़ी और हारी जा रही है।

'लैंसेट काउंटडाउन 2025' की रिपोर्ट के अनुसार, वायु प्रदूषण से भारत में प्रतिवर्ष 16.7 लाख असामयिक मौतें हो रही हैं। दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 450 के पार जाना अब कोई 'ब्रेकिंग न्यूज' नहीं, बल्कि सामान्य स्थिति बनती जा रही है। इसके कारण ज्ञात हैं—पराली, कोयला आधारित विद्युत संयंत्र, निर्माण कार्य की धूल और करोड़ों वाहनों का धुआं। समाधान भी सभी को पता हैं, लेकिन राजनीतिक और आर्थिक हितों के आगे जन-स्वास्थ्य गौण हो गया है।

नीति आयोग का 'कम्पोजिट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स' चेतावनी देता है कि 2030 तक देश के 21 बड़े शहरों में भूजल लगभग समाप्त हो सकता है। चेन्नई और बेंगलुरु इस संकट की झलक देख चुके हैं। एक ओर हर वर्ष बाढ़ से भारी आर्थिक क्षति होती है, तो दूसरी ओर करोड़ों नागरिक पानी की किल्लत झेल रहे हैं। हमने जल को ईश्वर का वरदान तो माना, पर राष्ट्रीय संपत्ति की तरह इसका संरक्षण नहीं किया।

विकास बनाम पर्यावरण की बहस में हमने अक्सर विकास को ही प्राथमिकता दी है। 'फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया' के अनुसार, 2021 से 2023 के बीच 1,03,616 हेक्टेयर वन क्षेत्र नष्ट हुआ है। जोशीमठ का धंसना और केरल की भूस्खलन जैसी त्रासदियां संकेत देती हैं कि प्रकृति किसी भी निर्माण के लिए 'अनापत्ति प्रमाणपत्र' (NOC) नहीं देती।

यदि वर्तमान उत्सर्जन दर बनी रही, तो 2050 का भारत गंभीर संकटों का सामना करेगा। कृषि उत्पादन में गिरावट, खाद्य असुरक्षा, जलवायु विस्थापन और आर्थिक क्षति इसके प्रमुख परिणाम होंगे। विश्व बैंक के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में करोड़ों लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हो सकते हैं। यह केवल पलायन नहीं, बल्कि सभ्यता का स्थानांतरण होगा।

अब समय बैठकों और प्रतीकात्मक आयोजनों का नहीं, बल्कि ठोस बदलाव का है। सिंगल-यूज प्लास्टिक का बहिष्कार, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, ऊर्जा की बचत और जल संरक्षण व्यक्तिगत स्तर पर आवश्यक कदम हैं। वहीं सरकार को 'पर्यावरण प्रभाव आकलन' (ईआईए) को मात्र एक औपचारिकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न के रूप में देखना होगा। पर्यावरण अपराधों पर कठोर दंड और जलवायु शिक्षा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना समय की मांग है।

पर्यावरण बचाना किसी संगठन या अभियान का एजेंडा नहीं, बल्कि मानव जाति के अस्तित्व का प्रश्न है। यदि 5 जून केवल पौधारोपण तक सीमित रह गया, तो इतिहास हमें उस पीढ़ी के रूप में याद करेगा जिसने सब कुछ जानते हुए भी कुछ नहीं किया। अब जागरूकता का नहीं, अस्तित्व संग्राम का समय है, क्योंकि लड़ाई आज की है, कल तो केवल इसके परिणाम होंगे।

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