संपादकीय
05 Jun, 2026

कागजों में नल है, पर जल नहीं: 'हर घर जल' की फाइलों में बहती गंगा, मध्यप्रदेश के गांवों में प्यासे होंठ

मालवौर पंचायत सहित मध्यप्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में नल-जल योजना के बावजूद पानी की गंभीर कमी और सरकारी दावों व जमीनी हकीकत के बीच बढ़ते अंतर को दर्शाती विस्तृत स्थिति सामने आई है।

बुरहानपुर, 5 जून ।

यह कहानी सिर्फ बुरहानपुर से 35 किमी दूर मालवौर पंचायत में 25 फीट गहरे गड्ढे से बूंद-बूंद पानी निकालने की नहीं है। पूरे मध्यप्रदेश में हालात बेहद गंभीर हैं। जल संकट सरकारी दावों की कलई खोल रहा है। कागजों पर '100 प्रतिशत हर घर जल' पहुँचाने की वास्तविकता कुछ और ही कह रही है। जमीन पर महिलाएं पथरीले रास्तों पर 3 किमी पैदल चलकर पानी लाने को मजबूर हैं।

'जल जीवन मिशन' के तहत 2024 तक हर घर नल से जल पहुँचाने का वादा किया गया था। प्रधानमंत्री के भाषणों से लेकर पंचायतों के बोर्ड तक 'हर घर जल' लिखा है। मध्यप्रदेश सरकार भी दावा करती है कि प्रदेश के 85 प्रतिशत से ज्यादा गांव 'हर घर जल' घोषित हो चुके हैं। लेकिन बुरहानपुर जिले की मालवौर पंचायत की तस्वीर इस दावे का मुखौटा नोच देती है। यहां नल तो लगे हैं, पर टोंटी से पानी नहीं, सिर्फ हवा निकलती है।

मध्यप्रदेश के हजारों गांवों की असलियत मालवौर पंचायत जैसी है। गांव में नल-जल योजना बनी, पाइप बिछे, टंकी भी बनी, पर पानी का स्रोत नहीं है। गर्मी में जलस्रोत सूख गए। अब गांव की महिलाएं 25 फीट गहरे पथरीले गड्ढों में उतरकर बूंद-बूंद पानी निकालती हैं। एक-एक बर्तन पानी के लिए जान जोखिम में डालती हैं। बच्चे स्कूल छोड़कर पानी ढोने को मजबूर हैं। 250 से ज्यादा आबादी वाले इस गांव में 'नल-जल योजना' सिर्फ दिखावे की बनकर रह गई है। गांव से एक किमी दूर नाले में बारिश का पानी जमा रहता है, वही गंदा और बदबूदार पानी मजबूरी में पीना पड़ रहा है।

जल जीवन मिशन पोर्टल पर मध्यप्रदेश में 1.22 करोड़ ग्रामीण परिवारों में से 1.04 करोड़ को नल कनेक्शन मिलने का दावा किया गया है, यानी 85 प्रतिशत कवरेज। लेकिन 'कनेक्शन' और 'पानी' में बड़ा फर्क है। सीएजी (CAG) की 2023 की रिपोर्ट बताती है कि मध्यप्रदेश में जिन घरों में नल लगाए गए, उनमें से 38 प्रतिशत में पानी ही नहीं आता। कारण हैं—स्रोत फेल होना, मोटर खराब होना, बिजली न होना और मेंटेनेंस का अभाव। मालवौर जैसी सैकड़ों पंचायतें हैं, जहां टंकी बनी, उद्घाटन हुआ, फोटो खिंची और फिर सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ दिया गया। अधिकारी लक्ष्य पूरा दिखाने के लिए कनेक्शन गिन लेते हैं, लेकिन पानी आया या नहीं, इसकी जांच नहीं होती।

इस विफलता के चार बड़े कारण हैं। पहला, स्रोत की अनदेखी। योजना बनाने से पहले भूजल स्तर, नदी-नाले और जल उपलब्धता का सही आकलन नहीं किया गया। सिर्फ पाइप बिछा दिए गए। गर्मी में हैंडपंप सूख गए तो टंकी में पानी कहां से आए? बुरहानपुर सहित निमाड़ क्षेत्र के कई गांवों में बोरवेल फेल हो चुके हैं।

दूसरा कारण बिजली और मेंटेनेंस का संकट है। ग्रामीण क्षेत्रों में 10 से 12 घंटे बिजली कटौती आम बात है। मोटर नहीं चलेगी तो टंकी नहीं भरेगी। ग्राम पंचायतों के पास पंप ऑपरेटर की सैलरी या मोटर सुधारने के लिए पर्याप्त धन नहीं है। 'नल चालू रखने' की जिम्मेदारी भी किसी की तय नहीं है।

तीसरा कारण ठेकेदारी संस्कृति है। काम जल निगम देता है और ठेकेदार घटिया पाइप डालकर चला जाता है। छह महीने में लीकेज शुरू हो जाता है। शिकायत करने पर जवाब मिलता है कि बजट नहीं है। मालवौर में भी ग्रामीणों ने बताया कि पाइपलाइन जगह-जगह टूटी हुई है।

चौथा कारण सत्यापन का खेल है। 'हर घर जल' गांव घोषित करने के लिए ग्राम सभा से प्रस्ताव लेना होता है। कई बार सरपंच और सचिव दबाव या लालच में फर्जी प्रस्ताव दे देते हैं। थर्ड पार्टी सत्यापन भी अक्सर सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाता है।

इसकी सबसे बड़ी कीमत महिलाएं और बच्चे चुका रहे हैं। 'हर घर जल' का सबसे बड़ा वादा महिलाओं को पानी के बोझ से मुक्ति दिलाना था। लेकिन मालवौर में आज भी सुबह 4 बजे से महिलाएं गड्ढे के पास लाइन लगाती हैं। 3-4 किमी पैदल चलना, 25 फीट नीचे उतरना और फिर सिर पर घड़ा लेकर ऊपर चढ़ना उनकी रोजमर्रा की मजबूरी है। इससे कमर टूटती है, गर्भवती महिलाओं को गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं और कई बार गर्भपात तक की नौबत आ जाती है। बच्चे स्कूल जाने के बजाय पानी भरने में लग जाते हैं। 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' का नारा यहां गड्ढे में डूब जाता है। गर्मी में गंदा पानी पीने से उल्टी-दस्त और पीलिया जैसी बीमारियां फैलती हैं, जबकि अस्पताल दूर हैं।

जब जल संकट को लेकर हाहाकार मचता है, तब पीएचई (PHE) विभाग हरकत में आता है। दो टैंकर भेज दिए जाते हैं और दो दिन बाद फिर वही हाल हो जाता है। अधिकारी कहते हैं, "सूखा है, क्या करें?" लेकिन सवाल यह है कि योजना बनाते समय सूखे की संभावना क्यों नहीं सोची गई? 15,000 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करने के बाद भी अगर जून में गांव प्यासे हैं, तो स्पष्ट है कि योजना और क्रियान्वयन दोनों विफल रहे हैं। 'हर घर जल उत्सव' मनाने वाले अफसर अब गांव जाने से कतराते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि नल तो है, लेकिन जल नहीं।

अब घोषणाओं से आगे बढ़कर कार्रवाई की जरूरत है। सरकार सिर्फ नल कनेक्शन गिनना बंद करे। यह सुनिश्चित किया जाए कि हर व्यक्ति को प्रतिदिन 55 लीटर पानी वास्तव में मिल रहा है या नहीं। थर्ड पार्टी से नियमित 'वाटर ऑडिट' कराया जाए। जहां भूजल समाप्त हो चुका है, वहां सतही जल और नदी आधारित समूह योजनाओं को प्राथमिकता दी जाए। रेन वाटर हार्वेस्टिंग को नल-जल योजनाओं से जोड़ा जाए। मालवौर जैसे गांवों में चेक डैम बनाए जाएं।

पंचायतों को संचालन और रखरखाव के लिए पर्याप्त फंड दिया जाए। सोलर पंप लगाए जाएं ताकि बिजली पर निर्भरता कम हो। 'जल सखी' जैसी व्यवस्थाओं को मानदेय के साथ लागू किया जाए। जवाबदेही भी तय हो। जिस गांव में सात दिन तक पानी न पहुंचे, वहां जेई (JE) से लेकर सीई (CE) तक की जवाबदेही तय की जाए। फर्जी तरीके से 'हर घर जल' घोषित करने वाले सरपंच और सचिवों पर कार्रवाई हो।

सच्चाई यह है कि पाइप में नहीं, नीति में लीकेज है। 'हर घर नल' लगा देना आसान है, लेकिन 'हर नल में जल' पहुँचाना ही असली शासन है। मध्यप्रदेश के गांव आज भी बता रहे हैं कि विकास फीता काटने से नहीं, टोंटी से पानी आने से होता है। बुरहानपुर की महिलाएं 25 फीट गहरे गड्ढे में सिर्फ पानी नहीं, सरकारी दावों की लाश निकाल रही हैं।

जब तक भोपाल के एसी कमरों में बैठकर 'सैचुरेशन' के ग्राफ देखने वालों में मालवौर के गड्ढे में उतरकर एक घड़ा पानी भरने की संवेदना नहीं आएगी, तब तक 'जल जीवन मिशन' सिर्फ 'जल मृगमरीचिका' बना रहेगा। कागज पर 'घर-घर जल' और जमीन पर 'बूंद-बूंद को तरसते हलक'—यही फर्क बताता है कि कमी संसाधनों में नहीं, संकल्प में है। और जब तक संकल्प नहीं आएगा, विभाग मुंह छिपाता ही घूमेगा।

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