भोपाल, 8 जून।
सरकार का दावा है कि रसोई गैस की कोई कमी नहीं है, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत दिखाई देती है। गांवों में उपभोक्ता 45 दिन और शहरों में 25 दिन तक सिलेंडर का इंतजार कर रहे हैं। नया गैस कनेक्शन प्राप्त करना भी किसी सरकारी लॉटरी से कम नहीं रह गया है। हाईकोर्ट की फटकार के बावजूद व्यवस्था यह मानने को तैयार नहीं कि समस्या गंभीर है।
सवाल यह है कि यदि गोदामों में पर्याप्त स्टॉक मौजूद है तो घरों की रसोई खाली क्यों हैं? उपभोक्ताओं को बताया जाता है कि स्टॉक नहीं है, जबकि दूसरी ओर वही सिलेंडर अधिक कीमत पर आसानी से उपलब्ध हो जाता है। 850 रुपये का सिलेंडर 1300 रुपये तक बेचे जाने की शिकायतें आम हैं। यह कमी नहीं, बल्कि वितरण व्यवस्था की विफलता और ब्लैक मार्केटिंग का संकेत है।
समस्या के पीछे एजेंसियों का एकाधिकार, कमजोर परिवहन व्यवस्था और नए कनेक्शनों की जटिल प्रक्रिया जैसे कई कारण हैं। कई स्थानों पर केवाईसी, सत्यापन और आवंटन के नाम पर उपभोक्ताओं को महीनों तक भटकाया जाता है। वहीं कमर्शियल सिलेंडरों पर अधिक कमीशन मिलने के कारण घरेलू उपभोक्ता उपेक्षा का शिकार होते हैं।
उज्ज्वला योजना का उद्देश्य स्वच्छ ईंधन को घर-घर पहुंचाना था, लेकिन अनियमित आपूर्ति और लंबी प्रतीक्षा ने इसके प्रभाव को कमजोर किया है। गांवों में कई परिवार फिर से लकड़ी और कंडों पर खाना बनाने को मजबूर हो रहे हैं।
अब समय केवल दावों का नहीं, जवाबदेही का है। गैस डिलीवरी की समयबद्ध गारंटी तय हो, देरी पर एजेंसियों पर जुर्माना लगे और ब्लैक मार्केटिंग पर कठोर कार्रवाई की जाए। चूल्हा राजनीति नहीं समझता, उसे केवल ईंधन चाहिए। यदि आम आदमी को रसोई गैस के लिए हफ्तों इंतजार करना पड़े, तो यह केवल आपूर्ति का नहीं, शासन की विश्वसनीयता का भी संकट है।














