मध्यप्रदेश की राजनीति में 18 जून को होने वाला राज्यसभा चुनाव सिर्फ तीन सीटों का गणित नहीं, बल्कि दोनों दलों के संगठनात्मक अनुशासन और भीतरी एकजुटता की असली परीक्षा बन गया है। भाजपा ने दो सीटों पर जीत लगभग तय होने के बावजूद तीसरा प्रत्याशी उतारकर जो रणनीति अपनाई है, वह साफ संकेत देती है कि कांग्रेस के किले में सेंध लगाने की तैयारी है। दूसरी ओर, दिग्विजय सिंह का यह बयान कि उन्हें कांग्रेस ने विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा में पर्याप्त अवसर दिए हैं, इसलिए अब किसी और को मौका मिलना चाहिए, महज त्याग नहीं बल्कि कांग्रेस के भीतर की बेचैनी का संकेत भी माना जा सकता है।
राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग गैरकानूनी नहीं होती, क्योंकि यहां व्हिप लागू नहीं होता। फिर भी जब इस प्रकार की घटनाएं बार-बार सामने आती हैं, तो जनादेश की भावना प्रभावित होती है। मध्यप्रदेश 2020 के राजनीतिक घटनाक्रम का दंश झेल चुका है। जनता ने 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को स्पष्ट बहुमत दिया है। ऐसे में यदि फिर जोड़-तोड़ की राजनीति चर्चा का विषय बनती है तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम नागरिक का भरोसा कमजोर पड़ सकता है।
विधानसभा में कुल 230 सदस्य हैं और राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 58 प्रथम वरीयता वोटों की आवश्यकता है। भाजपा के पास 163 विधायक हैं। इस आधार पर वह दो सीटें आसानी से जीत सकती है और उसके पास 47 वोट शेष बचते हैं। कांग्रेस के 66 विधायक हैं, जिन्हें अपनी एक सीट सुनिश्चित करने के लिए 58 वोट चाहिए। निर्दलीय, बसपा और सपा के एक-एक विधायक भी समीकरण को प्रभावित कर सकते हैं। भाजपा ने तीसरा उम्मीदवार उतारकर मुकाबले को रोचक बना दिया है। यदि उसे अतिरिक्त समर्थन मिलता है या कांग्रेस में क्रॉस वोटिंग होती है तो तीसरी सीट का परिणाम बदल सकता है। यही कारण है कि कांग्रेस अपने विधायकों को एकजुट रखने में जुटी है।
दिग्विजय सिंह का चुनाव न लड़ना भी महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश माना जा रहा है। वे प्रदेश कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ नेताओं में हैं और राज्यसभा में पार्टी की मुखर आवाज रहे हैं। उनका पीछे हटना यह दर्शाता है कि वे संगठनात्मक विवादों से दूर रहना चाहते हैं। 2023 की हार के बाद कांग्रेस अभी भी पुनर्गठन की प्रक्रिया में है। नेतृत्व परिवर्तन के बावजूद कई स्तरों पर संगठनात्मक चुनौतियां बनी हुई हैं। ऐसे में राज्यसभा चुनाव पार्टी की एकजुटता की परीक्षा बन गया है।
भाजपा के लिए तीसरा प्रत्याशी उतारना केवल दबाव की राजनीति नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संदेश भी है। 2023 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद पार्टी अपना मनोवैज्ञानिक प्रभाव बनाए रखना चाहती है। वहीं कांग्रेस के लिए यह चुनाव सिर्फ एक सीट बचाने का नहीं, बल्कि अपनी विश्वसनीयता और संगठनात्मक क्षमता साबित करने का अवसर है।
18 जून का मतदान यह तय करेगा कि कांग्रेस अपनी एकजुटता बनाए रखने में सफल होती है या नहीं। यदि वह अपनी सीट सुरक्षित रखती है तो नेतृत्व को मजबूती मिलेगी। वहीं किसी प्रकार की क्रॉस वोटिंग भविष्य की राजनीतिक चुनौतियों को और बढ़ा सकती है। भाजपा के लिए यह अवसर है, जबकि कांग्रेस के लिए यह परीक्षा।













