नई दिल्ली, 10 जून।
नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक यात्रा अक्सर रॉबर्ट फ्रॉस्ट की उस प्रसिद्ध पंक्ति की याद दिलाती है कि उन्होंने कम इस्तेमाल होने वाला रास्ता चुना और उसी ने सारा अंतर पैदा किया। भारत के इतिहास में जवाहरलाल नेहरू और नरेन्द्र मोदी दो अलग-अलग युगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। नेहरू ने नवस्वतंत्र और विभाजन से जूझ रहे भारत का नेतृत्व किया, जबकि मोदी ने वैश्विक प्रतिस्पर्धा, डिजिटल क्रांति और भू-राजनीतिक चुनौतियों के दौर में देश की कमान संभाली। दोनों की परिस्थितियां अलग थीं, इसलिए उनकी शासन शैली और प्राथमिकताएं भी भिन्न रहीं।
नेहरू का मॉडल संस्थानों के निर्माण और राज्य-नियंत्रित अर्थव्यवस्था पर आधारित था। उन्होंने संसदीय लोकतंत्र, वैज्ञानिक सोच और आईआईटी तथा एम्स जैसे संस्थानों की नींव रखी। वहीं मोदी ने शासन को जनभागीदारी और प्रत्यक्ष लाभ वितरण से जोड़ने का प्रयास किया। "सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास" के मंत्र के साथ बैंक खाते, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी), उज्ज्वला योजना, आवास, शौचालय, जलापूर्ति और डिजिटल सेवाओं के माध्यम से सरकारी योजनाओं को सीधे नागरिकों तक पहुंचाने पर बल दिया गया।
दोनों प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल की तुलना करते समय समय और परिस्थितियों का अंतर भी महत्वपूर्ण है। नेहरू के समय भारत की आबादी लगभग 34 करोड़ थी और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा सीमित थी। मोदी के नेतृत्व में देश की आबादी 140 करोड़ के करीब पहुंच चुकी है और लोकतंत्र अत्यंत प्रतिस्पर्धी तथा डिजिटल निगरानी वाले दौर में प्रवेश कर चुका है। 1952 के पहले आम चुनाव में लगभग 17 करोड़ मतदाता थे, जबकि 2014 में यह संख्या 83 करोड़ से अधिक हो गई और 2024 तक इसमें और वृद्धि हुई। ऐसे वातावरण में लगातार तीन बार राष्ट्रीय जनादेश प्राप्त करना उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता का संकेत माना जाता है।
आर्थिक मोर्चे पर नेहरू ने भारी उद्योगों और वैज्ञानिक संस्थानों का आधार तैयार किया, जबकि मोदी काल में भारत को वैश्विक विकास के प्रमुख इंजन के रूप में प्रस्तुत किया गया। कोविड-19 महामारी, महंगाई, आपूर्ति श्रृंखला संकट और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों के बावजूद भारत की औसत विकास दर लगभग 6.5 से 7 प्रतिशत के आसपास बनी रही। 2014 से 2024 के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क में 54 हजार किलोमीटर से अधिक का विस्तार हुआ। यूपीआई, आधार आधारित सेवाएं, डिजिटल भुगतान और पोर्टेबल कल्याणकारी योजनाओं ने शासन को अधिक तेज और पारदर्शी बनाया।
उच्च शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में भी विस्तार पर विशेष ध्यान दिया गया। आईआईटी की संख्या बढ़कर 23, आईआईएम की 21 और एम्स की संख्या 23 तक पहुंची। इससे उच्च शिक्षा और चिकित्सा सुविधाओं का दायरा व्यापक हुआ। सामाजिक प्रतिनिधित्व के स्तर पर भी अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देने का प्रयास किया गया। नारी शक्ति वंदन अधिनियम के माध्यम से महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का मार्ग प्रशस्त किया गया।
विदेश नीति में भी उल्लेखनीय बदलाव दिखाई देता है। नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति अपने समय की आवश्यकता थी, जबकि मोदी ने अमेरिका, रूस, यूरोप, खाड़ी देशों और ग्लोबल साउथ के साथ समानांतर संबंध विकसित करते हुए बहुआयामी कूटनीति अपनाई। भारत आज वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, जलवायु परिवर्तन और तकनीकी सहयोग जैसे मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभा रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की बढ़ती भूमिका इस परिवर्तन को रेखांकित करती है।
सुरक्षा के क्षेत्र में भी रणनीति अधिक सक्रिय दिखाई देती है। सीमाई चुनौतियों और बदलते वैश्विक परिदृश्य के बीच प्रतिरोधक क्षमता, सीमा प्रबंधन और त्वरित प्रतिक्रिया पर जोर दिया गया। वहीं खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में पीएल-480 के दौर से आगे बढ़कर देश आज रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन, डिजिटल सार्वजनिक वितरण प्रणाली और प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के माध्यम से लगभग 80 करोड़ लोगों तक मुफ्त अनाज पहुंचाने में सक्षम हुआ है।
पर्यावरण और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में भी संरक्षित क्षेत्रों, बाघ अभयारण्यों और रामसर स्थलों का विस्तार हुआ, वहीं चीतों का पुनर्प्रवेश और प्रमुख मंदिरों व विरासत स्थलों के पुनर्विकास जैसे कदमों ने सांस्कृतिक पहचान को नई अभिव्यक्ति दी।
नरेन्द्र मोदी ने राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर निर्वाचित प्रमुख के रूप में सबसे लंबा कार्यकाल पूरा करने का रिकॉर्ड बनाया है और लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में भी नया इतिहास रचा है। यदि नेहरू की विरासत ने आधुनिक भारत की संस्थागत नींव रखी, तो मोदी के नेतृत्व को उन संस्थाओं के व्यापक विस्तार, तकनीकी सशक्तीकरण, तेज क्रियान्वयन और वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती भूमिका के संदर्भ में देखा जाता है। अलग-अलग समय में अलग-अलग नेतृत्व की आवश्यकता होती है। एक युग ने ढांचा तैयार किया, तो दूसरे ने उसे विस्तार, गति और नई दिशा देने का प्रयास किया। यही कारण है कि अनेक लोगों की दृष्टि में नरेन्द्र मोदी का नेतृत्व समकालीन भारत की राजनीति और शासन व्यवस्था पर दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ने वाला युग सिद्ध हुआ है।









