संपादकीय
10 Jun, 2026

पेपर लीक की तकनीकी परिभाषा और जवाबदेही पर उठे सवाल: क्या शब्दों का खेल छात्रों के भविष्य पर भारी पड़ रहा है?

पेपर लीक के मामलों में एनटीए द्वारा अपनाई जा रही तकनीकी परिभाषाओं और टालमटोल के रवैये पर संसदीय समिति ने कड़ा रुख अपनाते हुए सिस्टम में सुधार की मांग की है।

भोपाल, 10 जून ।

नीट-यूजी 2024 से शुरू हुआ बवाल 2026 में भी थमा नहीं है। संसदीय समिति ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) से सीधा सवाल किया है कि पेपर लीक की परिभाषा क्या है। सवाल इसलिए उठा क्योंकि एनटीए का दावा लगातार यही रहा कि पेपर लीक नहीं हुआ। समिति के पास 2018 से अब तक आयोजित परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोपों की लंबी फेहरिस्त है, लेकिन एजेंसी हर बार तकनीकी परिभाषा की आड़ में जवाब से बचती नजर आती है। जब लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर हो, तब शब्दों का खेल सबसे खतरनाक धांधली बन जाता है।

गैस पेपर बनाम पेपर लीक : परिभाषा का भ्रमजाल

समिति ने एनटीए से स्पष्ट करने को कहा है कि उसकी नजर में पेपर लीक क्या है। एजेंसी का तर्क रहा है कि यदि परीक्षा शुरू होने से पहले प्रश्नपत्र का कोई सुनियोजित प्रसार न हुआ हो, तो उसे लीक नहीं कहा जाएगा। यानी यदि किसी एक सेंटर पर पेपर खुल गया, कुछ छात्रों ने उसे देख लिया और वॉट्सऐप पर उसकी तस्वीरें प्रसारित हो गईं, तो एनटीए उसे ‘गैस पेपर’ या ‘लोकल इंसिडेंट’ कहकर खारिज कर देती है।

समिति के सूत्रों के अनुसार एनटीए के अधिकारियों ने बताया कि उनकी प्रणाली में ‘गैस पेपर’ की कोई औपचारिक परिभाषा ही नहीं है। यह फर्क समझना जरूरी है। आम छात्र के लिए पेपर लीक का मतलब है कि परीक्षा से पहले प्रश्न किसी को भी मिल जाना। इससे मेहनत करने वाले और अनुचित लाभ लेने वाले के बीच समान अवसर समाप्त हो जाता है। लेकिन एजेंसी के लिए लीक तभी है, जब पूरा प्रश्नपत्र सुनियोजित तरीके से बाजार में बेचा जाए। इसी परिभाषा के सहारे 2018 से अब तक दर्जनों मामलों में एनटीए ने गलती मानने से इनकार किया है। नीट-यूजी 2024 में बिहार, गुजरात और राजस्थान में प्रश्नपत्र के हिस्से परीक्षा से लगभग 45 मिनट पहले टेलीग्राम पर मिलने के आरोप लगे थे। एनटीए ने इसे पेपर लीक मानने के बजाय सेंटर स्तर की गड़बड़ी बताया।

परीक्षा सिर्फ कागज का टुकड़ा नहीं, करोड़ों परिवारों का सपना है। जब एजेंसी ‘लीक नहीं हुआ’ की जिद पर अड़ी रहेगी, तो छात्रों में यह धारणा मजबूत होगी कि सिस्टम में धांधली है। संसदीय समिति का सवाल सही दिशा में है, लेकिन सवाल पूछने से ज्यादा जरूरी है कि जवाबों के आधार पर सुधार लागू हों।

एजेंसियों का नकारात्मक रुख : गलती नहीं, आर्गुमेंट

संसदीय समिति के सामने सबसे बड़ी चिंता एजेंसियों का रवैया है। गलती स्वीकार कर व्यवस्था सुधारने की जगह हर बार कानूनी और तकनीकी दलीलों का पुलिंदा सामने रख दिया जाता है। समिति ने पूछा कि 2018 से अब तक कितने प्रश्नपत्र लीक हुए। एनटीए का जवाब था—‘शून्य’। जबकि इसी अवधि में सीबीआई, ईडी और विभिन्न राज्य पुलिस एजेंसियों ने 11 मामलों में चार्जशीट दाखिल की है।

समस्या सिर्फ एनटीए तक सीमित नहीं है। यूजीसी-नेट, सीयूईटी, सिपाही भर्ती और शिक्षक पात्रता परीक्षा तक में यही पैटर्न दिखाई देता है। पहले इनकार, फिर ‘लोकल इंसिडेंट’, फिर ‘जांच जारी है’ और अंत में कुछ निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई। नीति बनाने वाले, टेंडर देने वाले और सॉफ्टवेयर उपलब्ध कराने वाली निजी कंपनियां अक्सर जवाबदेही से बच जाती हैं। समिति ने ओएमआर शीट, बायोमेट्रिक हाजिरी और सीसीटीवी फुटेज से जुड़े रिकॉर्ड की खामियों का भी मुद्दा उठाया। एनटीए का जवाब था कि इसके लिए तीसरे पक्ष की एजेंसियां जिम्मेदार हैं।

यह नकारात्मक रुख तीन तरह से नुकसान पहुंचाता है। पहला, छात्रों का मनोबल टूटता है। दूसरा, नकल माफिया का हौसला बढ़ता है क्योंकि उसे पता होता है कि सिस्टम खुद को बचाने में लगा है। तीसरा, ईमानदार अधिकारी भी सुधार का जोखिम नहीं लेते, क्योंकि गलती स्वीकार करने का अर्थ उनके लिए संकट बन सकता है।

लगातार धांधली की जड़ : संरचना में सेंध

पेपर लीक हो या गैस पेपर, असली सवाल यह है कि पांच वर्षों में परीक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर क्यों हो गई। इसके पीछे कई कारण हैं। पहला, आउटसोर्सिंग का मकड़जाल। एनटीए हो या राज्य आयोग, पेपर सेटिंग से लेकर सेंटर प्रबंधन तक का बड़ा हिस्सा निजी कंपनियों को सौंप दिया गया है। एक परीक्षा के लिए करोड़ों रुपये के टेंडर दिए जाते हैं, फिर कंपनियां सब-कॉन्ट्रैक्ट करती हैं और अंततः प्रश्नपत्र की सुरक्षा कमजोर स्तर तक पहुंच जाती है। जवाबदेही बिखर जाती है।

दूसरा, तकनीक पर अंधा भरोसा। डिजिटल लॉकर, एआई प्रॉक्टोरिंग और जैमर जैसी व्यवस्थाएं लागू की गईं, लेकिन नीट-यूजी 2024 में प्रश्नपत्र पेन ड्राइव के जरिए लीक होने के आरोप लगे। तकनीक तभी प्रभावी है, जब उसे संचालित करने वाला व्यक्ति ईमानदार हो। तीसरा, सजा का अभाव। पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट, 2024 लागू होने के बावजूद बड़े मास्टरमाइंड पर कड़ी कार्रवाई के उदाहरण बहुत कम हैं। जब जोखिम कम और मुनाफा बड़ा हो, तो धांधली को रोकना मुश्किल हो जाता है। चौथा, राजनीतिक संरक्षण। समिति के एक सदस्य ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा कि कई मामलों में जांच के तार कोचिंग माफिया और स्थानीय प्रभावशाली लोगों तक पहुंचते हैं, लेकिन कार्रवाई वहीं ठहर जाती है।

रोक कैसे लगेगी : परिभाषा से आगे समाधान

संसदीय समिति ने 10 जून तक एनटीए से जवाब मांगा है, लेकिन केवल जवाबों से स्थिति नहीं बदलेगी। आवश्यकता ठोस सुधारों की है। पेपर लीक की स्पष्ट कानूनी परिभाषा तय होनी चाहिए। यदि परीक्षा शुरू होने से एक मिनट पहले भी कोई प्रश्न बाहर पहुंचता है, तो उसे लीक माना जाना चाहिए। ‘गैस पेपर’ जैसे शब्दों की कोई जगह आधिकारिक शब्दावली में नहीं होनी चाहिए।

साथ ही, पेपर तैयार करने वाले से लेकर परीक्षा केंद्र के अंतिम कर्मचारी तक जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए। तकनीक का उपयोग पारदर्शिता बढ़ाने के लिए हो, न कि जिम्मेदारी टालने के लिए। परीक्षा केवल कागज का टुकड़ा नहीं, करोड़ों परिवारों के सपनों और युवाओं के भविष्य का आधार है। एजेंसियां भले ही तकनीकी शब्दों के सहारे खुद को बचाने का प्रयास करें, लेकिन जिस छात्र ने वर्षों की मेहनत की हो और किसी गड़बड़ी के कारण उसका भविष्य प्रभावित हो जाए, उसके लिए वह पूर्ण रूप से पेपर लीक ही है।

सरकार को समझना होगा कि परिभाषा बदलने से हकीकत नहीं बदलती। जब तक गलती स्वीकार कर तर्कों की जगह कार्रवाई नहीं होगी, तब तक हर नई परीक्षा एक नए विवाद का कारण बनती रहेगी। व्यवस्था में भरोसा तभी लौटेगा, जब जवाबदेही शब्दों में नहीं, परिणामों में दिखाई देगी।

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