भोपाल, 10 जून।
भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश है। यही युवा शक्ति आने वाले वर्षों में भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की सबसे बड़ी ताकत है। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं, वैश्विक कंपनियां और निवेशक भारत की ओर आशा भरी नजरों से देख रहे हैं। इसके पीछे केवल 140 करोड़ की आबादी नहीं, बल्कि करोड़ों ऊर्जावान, शिक्षित और मेहनती युवाओं की क्षमता है। ऐसे समय में यह आवश्यक है कि भारत की पहचान एक नवाचार करने वाले, परिश्रमी और उद्यमी युवा राष्ट्र के रूप में बने, न कि केवल आक्रोश और आंदोलनों की तस्वीरों से।
दुर्भाग्य से सोशल मीडिया के इस दौर में कुछ घटनाएं और कुछ समूह पूरे देश की छवि पर भारी पड़ जाते हैं। देश के करोड़ों युवा अपने कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, प्रयोगशालाओं, स्टार्टअप, उद्योगों, खेतों और दफ्तरों में दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, लेकिन सुर्खियां अक्सर उन तस्वीरों को मिलती हैं जिनमें प्रदर्शन और टकराव दिखाई देता है। यह समझना जरूरी है कि ऐसे सीमित समूह पूरे भारतीय युवा वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करते। भारत का वास्तविक युवा अपने परिवार के सपनों, अपने करियर और देश के विकास के लिए समर्पित है।
लोकतंत्र में अपनी बात रखना हर नागरिक का अधिकार है। असहमति भी लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन हर आंदोलन तभी सार्थक होता है जब उसके साथ व्यवहारिक समाधान और रचनात्मक सोच भी जुड़ी हो। केवल विरोध, नारे और उत्तेजना से न तो रोजगार पैदा होते हैं और न ही विकास की नई राह बनती है। इतिहास गवाह है कि जिन देशों ने अपनी युवा शक्ति को शिक्षा, अनुसंधान, उद्योग और नवाचार में लगाया, वही विश्व नेतृत्व तक पहुंचे।
आज भारत दुनिया के सबसे बड़े निवेश केंद्रों में तेजी से उभर रहा है। विदेशी और घरेलू कंपनियां यहां उद्योग स्थापित कर रही हैं, क्योंकि उन्हें भारत की स्थिर अर्थव्यवस्था और युवा प्रतिभा पर भरोसा है। लेकिन यदि लगातार देश की तस्वीर अशांत और टकरावपूर्ण दिखाई जाए तो इसका असर निवेशकों के विश्वास पर भी पड़ सकता है। निवेश कम होगा तो नए उद्योगों की गति धीमी होगी और रोजगार के अवसर भी प्रभावित होंगे। इसलिए यह समझना जरूरी है कि राष्ट्र की सकारात्मक छवि केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक की भी जिम्मेदारी है।
बेरोजगारी निश्चित रूप से एक चुनौती है और इस पर निरंतर काम करने की आवश्यकता है। सरकार कौशल विकास, स्टार्टअप, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया और बुनियादी ढांचे के विस्तार जैसे अनेक प्रयासों के माध्यम से रोजगार के अवसर बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है। लेकिन बदलती दुनिया में केवल डिग्री पर्याप्त नहीं है। आज कौशल, तकनीकी ज्ञान, नवाचार और उद्यमिता सफलता की नई कुंजी बन चुके हैं। हर युवा को यह समझना होगा कि अवसर का लाभ उठाने के लिए स्वयं पहल करनी पड़ती है। कोई भी व्यवस्था किसी व्यक्ति के घर जाकर उसके हाथ में सफलता नहीं सौंप सकती। मेहनत, निरंतर सीखने की इच्छा और जोखिम उठाने का साहस ही भविष्य का रास्ता बनाते हैं।
प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर भी समय-समय पर विवाद सामने आते रहे हैं। यह स्वीकार करना होगा कि दुनिया की सबसे आधुनिक व्यवस्थाओं में भी कभी-कभी कमियां रह जाती हैं। जहां मानवीय हस्तक्षेप होगा, वहां किसी कमजोर कड़ी का दुरुपयोग करने की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं की जा सकती। लेकिन किसी भी व्यवस्था की मजबूती इस बात में होती है कि गलती सामने आने पर उसे सुधारा जाए और भविष्य के लिए प्रणाली को अधिक सुरक्षित बनाया जाए। इसी दिशा में परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाने के प्रयास लगातार किए जा रहे हैं।
यह सही है कि परीक्षा दोबारा होने से मेहनती छात्रों को मानसिक और आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उनका समय और ऊर्जा प्रभावित होती है। लेकिन यदि किसी अपात्र अभ्यर्थी को गलत तरीके से सफलता मिल जाए और योग्य छात्र पीछे रह जाएं तो यह पूरे समाज के साथ अन्याय होगा। ऐसे में पुनर्परीक्षा के माध्यम से व्यवस्था की त्रुटि को सुधारना और भविष्य के लिए अधिक मजबूत परीक्षा प्रणाली विकसित करना एक आवश्यक कदम माना जा सकता है। युवाओं की असुविधा को कम करना भी जरूरी है और व्यवस्था को निष्पक्ष बनाना भी उतना ही आवश्यक है।
आज भारत का युवा पहले से कहीं अधिक जागरूक है। वह विश्व की बदलती अर्थव्यवस्था को समझता है और यह भी जानता है कि आने वाला समय ज्ञान, तकनीक और नवाचार का है। इसलिए उसे अपनी ऊर्जा को केवल क्षणिक आक्रोश में खर्च करने के बजाय शिक्षा, अनुसंधान, स्टार्टअप, स्वरोजगार और कौशल विकास में लगाना चाहिए। यही वह रास्ता है जो व्यक्तिगत सफलता के साथ-साथ राष्ट्र को भी नई ऊंचाइयों तक पहुंचाएगा।
हमारे माता-पिता अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा इसलिए दिलाते हैं कि वे आत्मनिर्भर बनें, परिवार का सहारा बनें और समाज के लिए प्रेरणा बनें। भारतीय संस्कृति भी कर्म, अनुशासन और जिम्मेदारी को सर्वोच्च मानती है। देश को ऐसे युवाओं की जरूरत है जो रोजगार मांगने के साथ-साथ रोजगार देने वाले बनें, जो नए उद्योग स्थापित करें, नई तकनीक विकसित करें और दुनिया के सामने भारत की नई पहचान गढ़ें।
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा शक्ति है। यदि यह शक्ति सही दिशा में आगे बढ़ेगी तो दुनिया भारत को केवल सबसे बड़ी आबादी वाले देश के रूप में नहीं, बल्कि सबसे बड़ी प्रतिभा और सबसे बड़े अवसर वाले राष्ट्र के रूप में देखेगी। समय की मांग है कि युवा भावनाओं से अधिक विवेक को महत्व दें, विरोध से अधिक समाधान पर विश्वास करें और आक्रोश से अधिक आत्मनिर्माण को अपना लक्ष्य बनाएं। यही रास्ता उन्हें व्यक्तिगत सफलता भी देगा और भारत को विश्व मंच पर और अधिक सम्मान, समृद्धि और नेतृत्व की ऊंचाइयों तक पहुंचाएगा।
-अपूर्व तिवारी










