भोपाल, 10 जून।
पंजाब के फरीदकोट जिले के पख्खी कलां गांव से सामने आई तस्वीर लोकतंत्र के माथे पर कालिख पोतने के लिए काफी है। थाने-चौकी से निराश किसानों ने चोरों के नाम पोस्टर चिपकाकर लिखा कि मोटर चोरी मत करो, अपना क्यूआर कोड लगा दो, हम सुरक्षा टैक्स के रूप में जितनी राशि मांगोगे, खाते में डाल देंगे। यह संदेश साफ बताता है कि व्यवस्था पर से जनता का भरोसा डगमगा रहा है। एक ही रात में 25 सिंचाई मोटरें चोरी हो गईं और पुलिस दो गिरफ्तारियों का दावा कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान रही है।
सरकार डिजिटल इंडिया का ढोल पीट रही है, लेकिन पख्खी कलां के किसानों ने उसका एक कड़वा व्यंग्य सामने रख दिया। चोर को क्यूआर कोड पर भुगतान करने का प्रस्ताव दरअसल कानून-व्यवस्था पर सीधा सवाल है। यदि किसान अपराधी से समझौता करने को मजबूर हो जाए, तो यह व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता है।
किसानों का यह पोस्टर केवल नाराजगी नहीं, बल्कि पुलिस तंत्र पर अविश्वास का प्रतीक है। मोटर, ट्रांसफार्मर और बिजली के तार चोरी होने के बाद कुछ ही समय में कबाड़ में बदल जाते हैं। ऐसे संगठित अपराध बिना मजबूत नेटवर्क के संभव नहीं हैं। ग्रामीणों का मानना है कि यदि कार्रवाई प्रभावी होती तो अपराधियों के हौसले इतने बुलंद न होते।
दूसरी ओर बेरोजगारी और नशे की समस्या ने भी हालात को गंभीर बनाया है। त्वरित कमाई की चाह में कुछ युवा चोरी जैसे अपराधों की ओर बढ़ रहे हैं। यदि अपराधियों में कानून का भय समाप्त हो जाए तो गांव सबसे आसान निशाना बन जाते हैं।
राजनीतिक प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठते हैं। जब तक किसी बड़ी घटना का असर सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंचता, तब तक ग्रामीण समस्याएं अक्सर उपेक्षित रह जाती हैं। किसानों की सुरक्षा और उनकी संपत्ति की रक्षा भी कानून-व्यवस्था का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा है जितना किसी शहर की सुरक्षा।
अब केवल बयानबाजी से काम नहीं चलेगा। पुलिस को कबाड़ी नेटवर्क पर सख्त कार्रवाई करनी होगी, चोरी के माल की खरीद-बिक्री पर निगरानी बढ़ानी होगी और ग्रामीण क्षेत्रों में नियमित गश्त सुनिश्चित करनी होगी। किसान सुरक्षा हेल्पलाइन की प्रभावी व्यवस्था और त्वरित पुलिस प्रतिक्रिया भी जरूरी है, ताकि लोगों का विश्वास दोबारा स्थापित हो सके।
पख्खी कलां का क्यूआर पोस्टर कोई चुटकुला नहीं, बल्कि चेतावनी है। जब नागरिकों का भरोसा कानून से हटकर अपराधियों पर टिकने लगे तो लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होने लगती है। सुरक्षा टैक्स जैसी सोच इस बात का संकेत है कि राज्य की मूल जिम्मेदारी पर सवाल उठ रहे हैं। यदि समय रहते कानून का इकबाल बहाल नहीं किया गया, तो यह प्रवृत्ति और खतरनाक रूप ले सकती है। जिस दिन अन्नदाता खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे, उस दिन केवल उसकी फसल ही नहीं, बल्कि व्यवस्था की साख भी संकट में पड़ जाती है।









