काठमांडू, 11 जून।
नेपाल की संसद में विपक्षी दलों का गतिरोध तो थम गया है, लेकिन प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के एक बयान पर विरोध की आग अब भी दहक रही है। प्रधानमंत्री ने दावा किया था कि नेपाल ने भी भारतीय क्षेत्र पर अतिक्रमण किया है, जिस पर विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।
विपक्षी सांसदों का कहना है कि 31 मई को दिए गए इस विवादास्पद बयान को बीते 10 दिन हो चुके हैं। इसके बावजूद प्रधानमंत्री ने न तो इस पर स्पष्टीकरण दिया, न ही इसे वापस लिया और न ही सदन में आकर कोई माफी मांगी है।
सीपीएन-यूएमएल, नेपाली कांग्रेस और आरपीपी समेत तमाम प्रमुख दलों ने इसे नेपाल की संप्रभुता और गरिमा का अपमान करार दिया है। नेताओं का आरोप है कि सरकार इस गंभीर राष्ट्रीय मुद्दे को नजरअंदाज कर रही है।
आरएसपी अध्यक्ष रवि लामिछाने से हुई चर्चा में कांग्रेस नेता भीष्मराज आङ्देम्बे ने इसे राष्ट्रवाद से जुड़ा मामला बताया। उन्होंने चेतावनी दी कि सरकार की चुप्पी से जनता की भावनाएं आहत हो रही हैं और इस पर स्थिति स्पष्ट न करना संदेहास्पद है।
विपक्ष ने सवाल किया है कि नेपाल ने आखिर कब और कहां भारत की जमीन पर कब्जा किया? नेताओं का कहना है कि लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी जैसे विवादों को सुलझाने के बजाय ऐसे बयानों से देश का पक्ष कमजोर हो रहा है।
विपक्षी दलों की मांग है कि या तो प्रधानमंत्री स्वयं सदन में आकर जवाब दें या किसी मंत्री के माध्यम से लिखित स्पष्टीकरण प्रस्तुत करें। उन्होंने साफ किया है कि राष्ट्रीय अखंडता के मुद्दे पर वे किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेंगे।










