नई दिल्ली, 12 जून।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई नीति आयोग की 11वीं गवर्निंग काउंसिल बैठक केवल एक औपचारिक बैठक नहीं थी, बल्कि केंद्र-राज्य संबंधों और सहकारी संघवाद की नई परीक्षा भी साबित हुई। पश्चिम बंगाल से शुभेंदु अधिकारी तथा कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल के नए नेतृत्व की मौजूदगी ने यह संकेत दिया कि विपक्षी दल भी संवाद की प्रक्रिया में लौट रहे हैं।
बैठक का सबसे सकारात्मक पक्ष यह रहा कि मुखर विपक्षी राज्यों ने चर्चा की मेज पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। यह सहकारी संघवाद की मूल भावना है। हालांकि, नीट को लेकर उठा विवाद यह भी बताता है कि केवल साथ बैठना पर्याप्त नहीं है। राज्यों की भौगोलिक, सामाजिक और भाषाई परिस्थितियां अलग हैं, इसलिए नीतियों में भी आवश्यक लचीलापन होना चाहिए। तमिलनाडु की मांग है कि यदि नीट से छूट संभव नहीं है तो कम से कम ग्रामीण छात्रों के लिए विशेष व्यवस्था पर विचार किया जाए।
बैठक में यह भी स्पष्ट हुआ कि नीति आयोग अब केवल सुझाव देने वाला थिंक टैंक नहीं, बल्कि संवाद का महत्वपूर्ण मंच बनता जा रहा है। विकसित भारत-2047 के लक्ष्य को लेकर केंद्र ने राज्यों से रोडमैप मांगा है, लेकिन इस लक्ष्य की सफलता वित्तीय सहयोग और आपसी विश्वास पर निर्भर करेगी। गैर-एनडीए शासित राज्यों की यह शिकायत रही है कि योजनाओं के वित्तपोषण और जीएसटी मुआवजे जैसे मुद्दों पर पर्याप्त सहयोग नहीं मिलता।
सहकारी संघवाद केवल बैठकों से मजबूत नहीं होगा, बल्कि राज्यों की वास्तविक चिंताओं को नीति निर्माण में स्थान देने से ही सार्थक बनेगा। 11वीं बैठक ने बहस और संवाद का द्वार जरूर खोला है, लेकिन यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह संवाद ठोस समाधान तक पहुंचता है या फिर अगली बैठक में वही मुद्दे दोबारा चर्चा का विषय बनते हैं। विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब केंद्र और राज्य प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि साझेदार की भूमिका निभाएं।












