मुंबई, 19 जून।
सिनेमाघरों में इस हफ्ते रिलीज हुई फिल्म 'हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं' एक दिलचस्प मर्डर मिस्ट्री है। थ्रिलर, ड्रामा और कॉमेडी के ताने-बाने से बुनी यह फिल्म दर्शकों को बांधे रखने का अच्छा प्रयास करती है। दिवंगत अभिनेता असरानी की अंतिम चंद फिल्मों का हिस्सा होने की वजह से इसका एक अलग भावनात्मक महत्व भी है। भंवर सिंह पुंडीर और मिलिंद गुनाजी जैसे मंझे हुए कलाकारों ने इस रहस्यमयी कहानी में अपने उम्दा अभिनय से जान फूंकने का काम किया है।
इस फिल्म समीक्षा की बात करें तो कथानक ठाकुर विश्वजीत सिंह और उनके कुनबे के इर्द-गिर्द बुना गया है। घर के आंतरिक मनमुटाव और तनाव के बीच अचानक एक खौफनाक मोड़ आता है। ठाकुर विश्वजीत सिंह की होने वाली बेटी के मंगेतर की बेहद सनसनीखेज तरीके से हत्या कर दी जाती है। इस कत्ल का शक सीधा ठाकुर पर ही जाकर टिकता है। मामले की पेचीदगी को देखते हुए तफ्तीश का जिम्मा तेजतर्रार इंस्पेक्टर देव और इंस्पेक्टर राणा को सौंप दिया जाता है।
जैसे-जैसे पुलिसिया जांच का दायरा बढ़ता है, वैसे-वैसे दफन राज बाहर आने लगते हैं। कहानी में हर मोड़ पर नए संदेह पैदा होते हैं, जिससे परिवार का प्रत्येक शख्स शक के घेरे में आ खड़ा होता है। दर्शक भी स्क्रीन पर चल रहे घटनाक्रम के साथ अंत तक कातिल की पहचान करने की कशमकश में उलझे रहते हैं।
अभिनय के मोर्चे पर असरानी ने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। उनका सधा हुआ अनुभव, लाजवाब डायलॉग डिलीवरी और नैचुरल एक्टिंग कई दृश्यों को बेहद जीवंत बना देती है। इंस्पेक्टर राणा की भूमिका में भंवर सिंह पुंडीर ने कमाल का संतुलन दिखाया है। उन्होंने एक पुलिस अधिकारी की संजीदगी को पर्दे पर बखूबी उतारा है। संदिग्ध के रूप में मिलिंद गुनाजी का रहस्यमयी अंदाज कहानी को गहराई देता है, वहीं जरीना वहाब और मुश्ताक खान ने भी अपने किरदारों से फिल्म को पूरा सहारा दिया है।
निर्देशक राकेश सावंत ने कहानी में सस्पेंस के भारीपन को कम करने के लिए हल्के-फुल्की कॉमेडी का जो तड़का लगाया है, वह सराहनीय है। हालांकि कुछ दृश्यों में आगे की कहानी का अंदाजा आसानी से लग जाता है, लेकिन इसके बावजूद कलाकारों का अभिनय दर्शकों को ऊबने नहीं देता। सस्पेंस और पारिवारिक जज्बातों की शौकीन जनता के लिए यह एक अच्छा विकल्प साबित हो सकती है।












