तबादलों के मौसम में साहब भी अपने पसंदीदा मोहरे को सही जगह फिट कराने की उम्मीद लेकर सबसे ऊंचे दरबार तक पहुंच गए। लौटे तो खाली हाथ ही नहीं, बल्कि उतरे हुए चेहरे के साथ।
जो लोग बाहर तक उन्हें बधाई देने की तैयारी कर रहे थे, उन्होंने भी नजरें फेर लीं। अब साहब गुनगुना रहे हैं कि उम्मीदें जितनी ऊंची हों, गिरावट भी उतनी ही जोरदार होती है।













