साहब को पूरा भरोसा था कि दरबार में उनकी एंट्री बिना दस्तक के होती है और फरमाइशें बिना फाइल के मंजूर। सो पूरी शान से अपनी बात रख दी।
जवाब में साफ़ 'ना' मिली तो चेहरे पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ा। लेकिन अगले ही पल वही मांग किसी और के लिए मंजूर होते देख नजदीकियों का सारा नशा कपूर की तरह उड़ गया। पता चल गया कि दरबार में पहचान और प्राथमिकता, दोनों अलग-अलग चीजें होती हैं।













