कुर्सी मिलते ही साहब की दुनिया बदल गई। पुराने साथी पुराने हो गए और नए चेहरों ने चारों ओर घेरा बना लिया। संघर्ष के दिनों की यादें भी फाइलों की तरह बंद हो गईं।
लेकिन कुर्सी गई तो नए साथी भी हवा हो गए। अब साहब फिर उन्हीं पुरानी गलियों का रास्ता तलाश रहे हैं, जहां कभी बिना बुलाए चाय मिल जाती थी। आखिर राजनीति में स्थायी अगर कुछ है तो वह परिस्थितियों का बदलना ही है।













