एक समय था जब कांग्रेस की राजनीति का युवा इंजन एनएसयूआई, युवक कांग्रेस और सेवा दल हुआ करते थे। कैंपस से लेकर चौपाल तक इन संगठनों की धमक थी। आंदोलन, सदस्यता अभियान और बूथ प्रबंधन की जिम्मेदारी इन्हीं के कंधों पर होती थी। परंतु आज मध्यप्रदेश में यही युवा विंग निष्क्रिय नजर आ रहे हैं। लंबे समय से सत्ता से बाहर रहने और जहां सत्ता है वहां भी सहयोगी संगठनों को अपेक्षित महत्व न मिलने का असर अब जमीन पर दिख रहा है। 2028 से पहले यह कांग्रेस के लिए सेल्फ गोल साबित हो सकता है।
हाल ही में भोपाल में एनएसयूआई प्रदेश अध्यक्ष को नोटिस दिए जाने का मामला सामने आया। 22 जिलों में आंदोलन की घोषणा हुई, लेकिन कुछ प्रतीकात्मक प्रदर्शनों के बाद गतिविधियां थम गईं। कभी छात्रसंघ चुनाव एनएसयूआई की सबसे बड़ी ताकत थे, आज कैंपस में उसकी सक्रियता सीमित दिखती है। संगठनात्मक चुनाव न होने और पदों का नियुक्ति आधारित होना भी कार्यकर्ताओं का उत्साह कम कर रहा है।
युवक कांग्रेस की स्थिति भी अलग नहीं है। पदाधिकारी हैं, लेकिन बूथ स्तर पर सक्रिय टीमों का अभाव है। 2028 तक बड़ी संख्या में नए युवा मतदाता जुड़ेंगे, पर उन्हें जोड़ने वाला संगठनात्मक ढांचा कमजोर पड़ चुका है। दूसरी ओर भाजपा का बूथ आधारित मॉडल लगातार सक्रिय है।
चुनावी राजनीति में 40 वर्ष से कम आयु के मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। सोशल मीडिया अभियान से अधिक प्रभाव बूथ स्तर की सक्रियता का होता है, और यही भूमिका पहले युवा संगठन निभाते थे। कांग्रेस को सदस्यता अभियान, छात्र-युवा मुद्दों पर सतत आंदोलन, बूथ स्तर पर युवा टीमों का गठन और संगठनात्मक चुनावों के जरिए युवा विंग को पुनर्जीवित करना होगा। अन्यथा युवा केवल नारों तक सीमित रह जाएंगे और उनका समर्थन विपक्ष के खाते में जाता रहेगा।












