नई दिल्ली, 27 जून।
भारत में लोकसभा सीटों के परिसीमन को लेकर एक बार फिर व्यापक बहस शुरू हो गई है। हाल ही में सामने आए नए प्रस्ताव में संकेत दिया गया है कि राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या में लगभग 50 प्रतिशत तक वृद्धि की जा सकती है, जबकि सीमित स्तर पर सीटों का पुनर्गठन होगा। यह केवल चुनावी गणित का विषय नहीं, बल्कि संघीय ढांचे, लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और क्षेत्रीय संतुलन से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है।
वर्तमान में लोकसभा में 543 निर्वाचित सदस्य हैं। पिछले कई दशकों में देश की जनसंख्या तेजी से बढ़ी है, लेकिन सांसदों की संख्या लगभग स्थिर बनी हुई है। परिणामस्वरूप एक सांसद पर मतदाताओं का बोझ लगातार बढ़ा है और कई संसदीय क्षेत्रों में प्रभावी जनप्रतिनिधित्व चुनौती बन गया है। इसलिए सीटों की संख्या बढ़ाने का विचार स्वाभाविक और आवश्यक माना जा सकता है।
हालांकि परिसीमन का प्रश्न केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण तक सीमित नहीं है। भारत एक संघीय लोकतंत्र है, जहां राज्यों के बीच राजनीतिक संतुलन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि केवल जनसंख्या को आधार बनाया गया तो अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को लाभ मिलेगा, जबकि दक्षिण भारत सहित वे राज्य, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है, अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी घटने की आशंका जता रहे हैं। ऐसे राज्यों का तर्क है कि राष्ट्रीय नीति के अनुरूप किए गए उनके प्रयासों का प्रतिकूल परिणाम नहीं होना चाहिए।
इसी कारण नए प्रस्ताव में सभी बड़े राज्यों की सीटों में लगभग समान अनुपात में वृद्धि का सुझाव महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे यह संदेश जाता है कि जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को दंडित नहीं किया जाएगा और तेजी से बढ़ती आबादी वाले राज्यों को असंतुलित राजनीतिक लाभ भी नहीं मिलेगा। भारतीय संघवाद की दृष्टि से यह संतुलित सोच प्रतीत होती है।
परिसीमन का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक और भौगोलिक प्रतिनिधित्व है। तेज शहरीकरण के कारण महानगरों और नगर क्षेत्रों की आबादी तेजी से बढ़ी है, जबकि कई ग्रामीण क्षेत्रों में वृद्धि अपेक्षाकृत कम रही है। ऐसे में निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण वर्तमान जनसंख्या और सामाजिक संरचना के अनुरूप होना चाहिए। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों के पुनर्गठन की संभावना भी सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकती है।
लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ने से राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों की रणनीतियों में बदलाव आएगा। नए निर्वाचन क्षेत्रों के गठन से नए नेतृत्व को अवसर मिलेंगे, वहीं चुनावी प्रबंधन और संसदीय कार्यप्रणाली जैसी व्यावहारिक चुनौतियां भी सामने आएंगी। इसलिए परिसीमन प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी, निष्पक्ष और व्यापक राजनीतिक सहमति पर आधारित होनी चाहिए।
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को समयानुकूल बनाना अनिवार्य है। परिवर्तन आवश्यक है, लेकिन वह ऐसा हो जो राष्ट्रीय एकता को मजबूत करे, राज्यों के बीच विश्वास बनाए रखे और लोकतंत्र को अधिक सहभागी बनाए। यदि परिसीमन संतुलित दृष्टिकोण, पारदर्शी प्रक्रिया और व्यापक सहमति के साथ लागू किया गया तो यह भारतीय लोकतंत्र को अधिक प्रतिनिधिक और प्रभावशाली बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।













